ग्वालियर (ब्यूरो)। ग्वालियर किले पर शिवमंदिर में स्थापित शिवलिंग को 17वीं शताब्दी में औरंगजेब ने किले से नीचे फेंक दिया था जो कि लगभग 500 मीटर दूर जाकर गिरा था। किले के नीचे उसी शिवलिंग को कोटेश्वर महादेव के नाम से सिंधिया राजवंश ने संवत 1937-38 में इसे पुनर्स्थापित किया। किले पर बने शिव मंदिर में होने वाले जलाभिषेक से किले पर वाटर हार्वेस्टिंग होती थी।

आज सावन का पहला सोमवार है, आज हम भोले बाबा के भक्तों को कोटेश्वर महादेव के उस प्राचीन मंदिर के दर्शन करवा रहे हैं। जिसे उजाड़ने का आदेश औरंगजेब ने अपने सैनिकों को दिया था। सैनिकों ने बाबा के मंदिर से शिवलिंग को उखाड़ने का प्रयास किया जिसके बाद वहां पर सैकड़ों की संख्या में नाग पहुंच गए और उन्होंने सैनिकों को डंस लिया था। इसके बाद सैनिकों ने किसी तरह मंदिर में स्थापित प्रतिमा को किले से नीचे तलहटी में फेंक दिया। इसके बाद सैनिकों ने अपनी प्यास बुझाने के लिए अभिषेक किए गए जल का आचमन किया, इसके बाद सभी सैनिक मारे गए। शिवलिंग किला तलहटी में 150 साल पड़ा रहा, बाद में सिंधिया राजवंश ने किला तलहटी से कुछ दूरी पर बंजारों के मंदिर के पास कोटेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की।

ऐसे होती थी किले पर वाटर हार्वेस्टिंग

किले पर स्थित शिव मंदिर में बाबा का अभिषेक होता था, यह जल मंदिर से नीचे बने एक छोटे से कुंड में एकत्रित होता था। इस कुंड से लगभग 4 इंच मोटे पाइप लाइन से यह पानी बहकर नीचे आता था। जो कि एक बड़े कुंड में एकत्रित होता था। इस कुंड में नीचे तक जाने की किसी को इजाजत नहीं थी। जिसे भी अभिषेक किए गए जल का प्रसाद लेना होता था वह सीढ़ियों पर खड़े होकर जल ग्रहण कर लेता था। यहां से यह जल किले की पहाड़ी में वाटर हार्वेस्टिंग के जरिए पहुंचता था। वहीं वर्तमान में कोटेश्वर महादेव मंदिर के ठीक पीछे पहले बंजारों का शिव मंदिर और दो बावड़ी थीं। औरगंजेब ने इस मंदिर से शिवलिंग को निकालकर इसी बावड़ी में फेंक दिया था, यह बावड़ी लगभग 12 मंजिला गहरी है। लेकिन वर्तमान में इसके अंदर 30 से 40 फीट पर पानी है। इस बावड़ी में कोटेश्वर महादेव मंदिर में चढ़ाया गया जल एवं बारिश का पानी परिसर में बनी नालियों के जरिए बहकर पहुंचता है।

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