सिर्फ वेतन के आधार पर खारिज नहीं कर सकते OBC सर्टिफिकेट, माता-पिता का पद और सर्विस स्टेटस देखना भी जरूरी
हाई कोर्ट ने आवेदिका रागिनी राठौर के मामले में पूर्व में पारित दोनों आदेश निरस्त कर दिए और प्रकरण को नए सिरे से निर्णय के लिए सक्षम अधिकारी के पास भेज...और पढ़ें
Publish Date: Thu, 01 Oct 2026 07:52:04 PM (IST)Updated Date: Thu, 01 Oct 2026 08:00:17 PM (IST)
HighLights
- सिर्फ आय नहीं, पद भी मापदंड
- पुरानों आदेशों को किया निरस्त
- सक्षम अधिकारी करेंगे नए सिरे से जांच
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। ओबीसी प्रमाणपत्र से जुड़े मामले में हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि क्रीमीलेयर का निर्धारण केवल माता-पिता के वेतन की राशि के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित अभिभावक की सेवा स्थिति, पद की श्रेणी, पदोन्नति की तारीख और आय के स्वरूप सहित अन्य निर्धारित मापदंडों की भी जांच करना जरूरी है।
कोर्ट ने आवेदिका रागिनी राठौर के मामले में पूर्व में पारित दोनों आदेश निरस्त कर दिए और प्रकरण को नए सिरे से निर्णय के लिए सक्षम अधिकारी के पास भेज दिया।
अपीलीय अधिकारी ने भी रखा था आदेश बरकरार
न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के ने 29 सितंबर को पारित आदेश में कहा कि रागिनी के आवेदन को मुख्य रूप से उनके पिता की 16.99 लाख रुपये की आय को निर्धारित सीमा से अधिक मानते हुए खारिज किया गया था। अपीलीय अधिकारी ने भी इसी आधार पर आदेश बरकरार रखा था। कोर्ट ने कहा कि मामले का निर्णय केवल पिता को मिलने वाले वेतन की राशि देखकर नहीं किया जा सकता।
रागिनी की ओर से बताया गया कि उनके पिता की प्रारंभिक नियुक्ति सिविल जज वर्ग-दो के पद पर हुई थी और उन्हें 16 जून 2008 को 40 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद सिविल जज वर्ग-एक के पद पर पदोन्नति मिली। यह भी दावा किया गया कि पिता की आय का स्रोत केवल वेतन है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन मामले में 11 मार्च 2026 को दिए फैसले का भी उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमीलेयर निर्धारण में केवल आय सीमा को यांत्रिक तरीके से लागू करने के बजाय माता-पिता के पद और सेवा श्रेणी जैसे पहलुओं को भी प्रासंगिक माना था।
सक्षम प्राधिकारी करेंगे जांच
हाई कोर्ट ने कहा कि इन सभी पहलुओं की जांच सक्षम प्राधिकारी द्वारा की जानी चाहिए। इसलिए 23 अक्टूबर 2020 को अनुविभागीय अधिकारी द्वारा और 29 नवंबर 2022 को अपर कलेक्टर द्वारा पारित आदेशों को निरस्त कर दिया गया। सक्षम अधिकारी को सरकारी परिपत्रों, पिता की सेवा स्थिति, पदोन्नति की तारीख, आय के स्रोत और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर छह सप्ताह में कारणयुक्त आदेश पारित करने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि, हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि उसने रागिनी के ओबीसी प्रमाणपत्र के दावे पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। प्रमाणपत्र जारी होगा या नहीं, इसका फैसला अब सक्षम अधिकारी को लागू नियमों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर करना होगा।