
ग्वालियर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। शहरवासियों को वर्ष 2050 तक पेयजल की समस्या का सामना न करना पड़े, इसके लिए नगर निगम ने पानी के स्रोतों की खोज शुरू कर दी है। जानकारों के अनुसार अकेले चंबल से पानी लाने की परियोजना से आगामी 22 साल तक शहर की प्यास नहीं बुझ पाएगी। यहां से सिर्फ 150 एमएलडी (मिलियन लीटर डे) पानी मिल सकता है, लेकिन उसमें से भी मुरैना शहर के लिए आपूर्ति की जाएगी। ऐसे में अब निगम अफसरों ने चंबल से पानी लाने की डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) को रिवाइज कराने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा जल संसाधन विभाग को पत्र लिखकर पूछा जा रहा है कि वे अपने किन जल स्रोतों से शहर को पानी उपलब्ध करा सकते हैं।
अल्पवर्षा की स्थिति में शहर को पेयजल देने वाले तिघरा का जलस्तर कम हो जाता है। इसे अपर ककैटो, ककैटो और पेहसारी बांध से पानी लिफ्ट कर भरा जाता है। वर्ष 2050 तक बढ़ती हुई जनसंख्या के हिसाब से चंबल नदी से पानी लाने की योजना तैयार की गई थी। शहर में चंबल नदी से पानी लाने के लिए नगर निगम तीसरी बार डीपीआर पर काम करा रहा है। ग्वालियर की आबादी के हिसाब से प्रतिदिन 150 एमएलडी पानी की आवश्यकता है, लेकिन पर्यावरणीय स्वीकृति के मुताबिक चंबल नदी से 150 एमएलडी पानी ही प्रतिदिन मिल सकता है। इसमें भी मुरैना को लगभग 65 एमएलडी प्रतिदिन पानी की आवश्यकता है। ऐसे में ग्वालियर को चंबल नदी से 85 एमएलडी पानी ही उपलब्ध हो पाएगा। इसको देखते हुए निगम के अफसरों ने जल संसाधन विभाग के अफसरों से चर्चा कर पानी के अन्य स्रोत तलाश करने शुरू कर दिए हैं। इसमें मुख्यत: कोतवाल डेम को बड़ा स्रोत माना जा रहा है। यहां चंबल नदी की नहर से पानी आता है। निगम अफसरों की योजना है कि बचे हुए पानी की आपूर्ति कोतवाल डेम से कर ली जाए।
मुरैना जिले की डीपीआर के कारण संशयः चंबल का पानी ग्वालियर तक लाने के लिए मुरैना जिले में ही इंटक वेल तैयार किए जाएंगे। इंटक वेल तक पानी लाकर इसे ग्वालियर के लिए पंप किया जाएगा, इसमें ट्यूबवेल की आवश्यकता होगी। इसके लिए मुरैना नगर निगम ने भी डीपीआर तैयार की है, लेकिन उसमें तकनीकी दिक्कत के कारण पानी लिफ्ट करने की समस्या रहेगी। इसके चलते भी संशय की स्थिति खड़ी हो गई है।
आधा खाली हो चुका है तिघरा: शहर में इन दिनों नगर निगम प्रतिदिन पानी की सप्लाई कर रहा है। छह जून तक तिघरा डेम लगभग आधा खाली हो चुका है। इसमें अब अपनी क्षमता का 52 प्रतिशत पानी बचा हुआ है। अफसरों का मानना है कि मानसून आने तक यह स्तर 42 से 45 प्रतिशत के बीच रहेगा। यदि वर्षा ठीक रही, तो डेम दोबारा भर जाएगा और इससे अगले वर्ष तक पानी की आपूर्ति की जा सकेगी। यदि वर्षा ठीक नहीं हुई, तो दिक्कत हो सकती है। ऐसे में अन्य विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है।