ग्वालियर.नईदुनिया प्रतिनिधि। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि 20 अगस्त को गोगा नवमी मनाई जाएगी। ज्योतिषाचार्य सुनील चोपड़ा ने बताया कि गोगा नवमी का त्योहार वाल्मीकि समाज अपने आराध्य देव वीर गोगादेव जी महाराज के जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं। गांव व शहरों में परंपरागत श्रद्धा, भक्ति एवं उत्साह और उमंग के साथ गोगा नवमी के रूप में यह पर्व हर्षोल्लासपूर्वक मनाया जाता है।यह पर्व श्रावणी पूर्णिमा से आरंभ होता है और 9 दिनों तक चलता है। भक्तगण गोगादेव के जयकारों के साथ झंडे उठाते है, इन झंडाधरी भगतों का स्वागत किया जाता है। शोभायात्राएं निकाली जाती हैं। निशानों का यह कारवां कई शहरों में पूरी रात निकलता है। ग्वालियर में यह सभी महाराज बाड़े पर एकत्रित होते है।जहां गोगाजी के गीत गाये जाते है। गोगा जी गायन प्रस्तुत किया जाता है। महाराज बड़े को सजाया जाता है, वह मेला जैसा लग जाता है। और बाद में प्रसाद वितरण किया जाता है।

इस अवसर पर बाबा जाहरवीर (गोगाजी) के भक्त अपने घरों में ईष्टदेव की वेदी बनाकर अखंड ज्योति जागरण कराते हैं तथा गोगा देवजी की शौर्य गाथा एवं जन्म कथा सुनते हैं। इस प्रथा को जाहरवीर का जोत कथा जागरण कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि गोगादेव की पूजा करने से सर्पदंश से बचा जा सकता है। इसलिए इस दिन नागदेवता की पूजा करने का भी विधान है। गोगादेव गुरु गोरखनाथ के परम शिष्य थे।

गोगादेव से जुड़ी एक लोक कथा भी है उसके अनुसार, गोगाजी का जन्म विक्रम संवत 1003 में राजस्थान के चुरू नामक स्थान पर चौहान वंश के राजपूत वंश में हुआ था। गोगाजी गुरु गोरखनाथ के परम शिष्य थे। लोककथाओं के अनुसार, गोगाजी को सांपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। इन्हें गोगाजी, गुग्गा वीर, जाहिर वीर, राजा मण्डलिक व जाहर पीर के नामों से भी पुकारा जाता है। राजस्थान के छह सिद्धों में गोगाजी को प्रथम माना गया है। सैकड़ों वर्ष बीतने के बाद भी गोगादेव की जन्मभूमि पर आज भी उनके घोड़े का अस्तबल है और उनके घोड़े की रकाब अभी भी वहीं पर स्थित है। यहां गुरु गोरक्षनाथ का आश्रम भी है और वहीं गोगादेव की घोड़े पर सवार मूर्ति स्थापित है। उनका जन्मस्थान पर आज भी सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोग सर झुकाने के लिए दूर-दूर से आते हैं। यह एक ऐसा स्थान है जो हिंदू और मुस्लिम एकता का प्रतीक है।

Posted By: anil tomar

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