ग्वालियर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: STA पुनर्गठन के दूसरे नोटिफिकेशन पर भी लगाई रोक, परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर जताई कड़ी नाराजगी
Gwalior Bench Transport Department: मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ की टिप्पणी से साफ है कि एसटीए के पुनर्गठन की प्रक्रिया और उसे लेकर जारी अधिसूचनाओं को लेकर न्यायालय गंभीर है। कोर्ट ने इस मामले में एक इंटरवेनर को भी शामिल होने की अनुमति नहीं दी।
Publish Date: Fri, 21 Aug 2026 07:53:57 AM (IST)Updated Date: Fri, 21 Aug 2026 07:54:25 AM (IST)
ग्वालियर स्थित परिवहन आयुक्त कार्यालयl नईदुनिया आर्काइवHighLights
- प्रभारी पीएस और सचिव के रहते गलत नोटिफिकेशन जारी होने पर कोर्ट सख्त।
- ग्वालियर से भोपाल दफ्तर ले जाने की आशंका से बस ऑपरेटरों में असंतोष।
- बिना डेलिगेशन और कोरम के फाइलों को ट्रांसफर करने पर कानूनी पेंच।
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। राज्य परिवहन प्राधिकार (STA) के पुनर्गठन को लेकर चल रहे विवाद में मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने परिवहन विभाग द्वारा जारी दूसरे नोटिफिकेशन पर भी रोक (स्टे) लगा दी। गुरुवार को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई और सवाल किया कि जब विभाग में सचिव और प्रभारी प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी मौजूद हैं, तो इस तरह का नोटिफिकेशन कैसे जारी कर दिया गया। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया के समक्ष हुई।
कोर्ट की टिप्पणी से साफ है कि एसटीए के पुनर्गठन की प्रक्रिया और उसे लेकर जारी अधिसूचनाओं को लेकर न्यायालय गंभीर है। कोर्ट ने इस मामले में एक इंटरवेनर को भी शामिल होने की अनुमति नहीं दी।
बस आपरेटरों ने उठाया है एसटीए के गठन पर सवाल
यह विवाद बस आपरेटर हरिशंकर सिंह पटेल और देवेंद्र मोहन शर्मा की ओर से दायर याचिका से शुरू हुआ। याचिकाकर्ताओं ने नौ फरवरी 2026 को जारी एसटीए के पुनर्गठन संबंधी अधिसूचना को हाई कोर्ट में चुनौती दी है। उनका कहना है कि पुनर्गठन की प्रक्रिया मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 68 के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। याचिका में एसटीए को अर्ध-न्यायिक संस्था बताते हुए कहा गया है कि बस परमिट, रूट आवंटन और परमिट नवीनीकरण जैसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली इस संस्था के गठन में कानून के प्रविधानों का पालन आवश्यक है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि नए गठन में ऐसे अधिकारी को भी शामिल किया गया, जिससे हितों के टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है।
ग्वालियर से भोपाल शिफ्टिंग का भी मुद्दा
याचिका में एसटीए के मुख्यालय को ग्वालियर से भोपाल ले जाने की आशंका भी जताई गई है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार एसटीए का मुख्यालय लंबे समय से ग्वालियर में रहा है और यहां परिवहन आयुक्त तथा अपीलीय प्राधिकरण से संबंधित व्यवस्था भी मौजूद है। मुख्यालय स्थानांतरित होने पर प्रदेशभर के बस ऑपरेटरों, परिवहन कारोबारियों और अधिवक्ताओं को परेशानी होने का तर्क दिया गया है।
पहले नोटिफिकेशन पर भी कोर्ट की नजर
मामले में पहले जारी अधिसूचना को लेकर हाई कोर्ट पहले ही राज्य सरकार सहित संबंधित अधिकारियों से जवाब मांग चुका है। याचिका में सरकार की ओर से पूर्व में कोर्ट को बताया गया था कि नई अधिसूचना जारी करने का प्रस्ताव कोआर्डिनेशन कमेटी को भेजा गया है और मंजूरी के बाद उसे परिवहन प्राधिकरण को भेजा जाएगा। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने सरकार को यह कहते हुए अंतिम अवसर दिया था कि इसी तरह के आश्वासन पिछली तारीखों पर भी दिए जा चुके हैं। अब दूसरे नोटिफिकेशन पर भी रोक लगाए जाने के बाद एसटीए के पुनर्गठन का विवाद और गहरा गया है।
राज्य परिवहन प्राधिकरण: ग्वालियर से भोपाल तक क्या-क्या हुआ
- 9 फरवरी को नया नोटिफिकेशन जारी किया गया जिसमें प्रमुख सचिव गृह शिवशेखर शुक्ला को अध्यक्ष बनाया गया। गृह व जेल विभाग उप सचिव कमल नागर को एसटीए का सचिव बनाया गया। इसके काम एसटीए का काम शुरू किया गया। इसके बाद 15 दिन तक शिवशेखर शुक्ला ने ज्वाइन नहीं किया लेकिन कमल नागर ने इस पीरियड में भी एसटीए के स्टाफ केा बुलाने के आदेश जारी किए। उन्हें यह पावर डेलिगेट नहीं थे। इसके बाद गृह सचिव पद पर शिवशेखर शुक्ला की जगह पर संजय शुक्ला नियुक्त हुए जोकि एसटीए के अध्यक्ष भी हुए। एसटीए का अध्यक्ष एसटीए के सचिव को काम करने के लिए पावर डेलिगेट करता है। अध्यक्ष संजय शुक्ला ने मई माह में अपने पावर कमल नागर को डेलिगेट किए। पावर डेलिगेशन से पहले ग्वालियर के एसटीए के स्टाफ को भोपाल बुला लिया गया और फाइलों को भी बुलवा लिया।
सचिव को जो पावर डेलिगेट होती है उसमें अस्थाई परमिट, वाहन परिवर्तन, अन्य स्टेट के परमिटों का काउंटर सिग्नेचर चाहे वह पक्के हों या टीपी हों। साथ में पक्के परमिटों का नवीनीकरण भी रहता है, फाइल बढ़ती है तो पहले ट्रांसपोर्ट कमिश्नर साइन करते हैं फिर अध्यक्ष के साइन होते हैं। इसके बाद एसटीए का कोरम पूरा होता है। तब तक इन सारे परमिटों की कार्रवाई व सुनवाई एसटीए का सचिव करता है। जब पक्के नए परमिट दूसरी स्टेट को जारी करने होते हैं तो पूरे बोर्ड की बैठक होती है जिसमें कार्रवाई का संचालन एसटीए सचिव करते हैं लेकिन आखिरी में आर्डर जारी व निर्णय अध्यक्ष व ट्रांसपोर्ट कमिश्नर तय करते हैं, इसके लिए बैठक बुलानी ही पड़ती है।
- मई में संजय शुक्ला की तरफ से कमल नागर को पावर डेलिगेट हुए इस नोटिफिकेशन को चैंलेंज किया गया। एक माह का परिवहन विभाग को समय मिला। इस अवधि में परमिट बनने का काम जारी रहा। अब जैसे ही हाई कोर्ट में जवाब पेश हुआ उसमें कहा कि नोटिफिकेशन गलत है और सुधार के लिए परमिशन मांगी गई। इसपर याचिकाकर्ता ने कहा कि जब नोटिफिकेशन गलत है तो काम कैसे कर रहे है। इसपर हाई कोर्ट ने पहली बार नोटिफिकेशन को स्टे कर दिया। यह नोटिफिकेशन जारी परिवहन सचिव मनीष सिंह की ओर से हुआ था। इस बीच कमल नागर को सीएस ने तबादला कर गृह व जेल के अतिरिक्त प्रभार से मुक्त कर दिया तो इस तरह एसटीए सचिव से भी मुक्त हुए। इसके बाद उप सचिव अरूण सिंह गृह व जेल का प्रभार दिया। इसके अरुण सिंह को ज्वाइन कराया गया। कमल नागर को परिवहन विभाग से रिलीव नहीं किया गया है।