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नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने करीब 29 सालों से पेंडिंग चल रहे 'जेसी मिल्स लिमिटेड' के परिसमापन (लिक्विडेशन) मामले में एक अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस आशीष श्रोती की एकलपीठ ने मजदूर कांग्रेस की तरफ से दाखिल तीन अंतरिम आवेदनों का निपटारा करते हुए साफ कर दिया कि 7,839 पूर्व कर्मचारियों के जिन दावों का निपटारा पहले ही किया जा चुका है, उन्हें अब दोबारा स्वीकार नहीं किया जाएगा।
हालांकि, राहत की बात यह है कि अदालत ने कर्मचारियों को कंपनी बंद होने की तारीख से लेकर 4 मई 1998 (कंपनी के लिक्विडेशन ऑर्डर की तारीख) तक की बकाया राशि पर 4 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का बड़ा निर्देश दिया है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान याद दिलाया कि साल 2009 में डिस्ट्रिक्ट रिटायर्ड जज एस.एस. त्रिवेदी की अध्यक्षता वाली समिति ने 7,839 पूर्व कर्मचारियों के दावों की बारीकी से जांच की थी। तब समिति ने 102.36 करोड़ रुपए से अधिक की राशि भुगतान योग्य मानी थी।
हाईकोर्ट ने 15 अप्रैल 2009 को इस रिपोर्ट को हरी झंडी दे दी थी और उसी आधार पर कर्मचारियों को समय-समय पर उनके हक का पैसा भी दिया गया।
मामले में मोड़ तब आया जब बाद में कुछ ऐसे कर्मचारियों और लेनदारों के नाम सामने आए, जिनके दावों का परीक्षण 2009 में नहीं हो पाया था। इन छूटे हुए मामलों के निपटारे के लिए साल 2024 में 'वी. बगले एंड कंपनी' की समिति बनाई गई।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बगले समिति का काम केवल और केवल उन छूटे हुए कर्मचारियों व अन्य लेनदारों के दावों का सत्यापन करना था, जिनका पहले हिसाब नहीं हुआ था।
मजदूर कांग्रेस ने याचिका में दावा किया था कि त्रिवेदी समिति ने नोटिस पे, बोनस, लीव एनकैशमेंट, एलटीए, पीएफ और अन्य मदों पर सही से विचार नहीं किया था। इसके तहत करीब 188.88 करोड़ रुपए के अतिरिक्त दावे बगले समिति के सामने नहीं रखे गए।
हाईकोर्ट ने मजदूर कांग्रेस की इस दलील को तथ्यात्मक रूप से गलत करार दिया। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि त्रिवेदी समिति पहले ही इन सभी दावों पर गहराई से विचार कर चुकी थी और नोटिस पे, बोनस, लीव पे तथा यात्रा भत्ते जैसे दावों को ठोस कारणों के साथ खारिज कर चुकी थी। इसलिए एक ही मामले को बार-बार नए सिरे से नहीं खोला जा सकता।