Gwalior News: ग्वालियर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। रेलवे और स्वास्थ्य विभाग के बीच टालमटोल भरा रवैया है। जो यात्रियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। स्टेशन के प्लेटफार्म या ट्रेन में यात्री की तबीयत बिगड़ने पर रेलवे का अमला स्वास्थ्य विभाग को सूचना देकर इतिश्री कर लेता है। यात्री की जान चली जाए, तो स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि हमें सूचना ही नहीं मिली।
28 दिन के अंदर रेलवे स्टेशन पर यह दूसरी घटना है, जब यात्री की तबियत बिगड़ी और दोनों विभागों ने अपना-अपना पल्ला झाड़ लिया। स्वास्थ्य विभाग की 108 एंबुलेंस सेवा पर गत दिसंबर माह में उस समय भी सवाल खड़े हुए थे, जब झांसी के निजी विश्वविद्यालय के कुलपति रणजीत सिंह की ट्रेन में तबीयत खराब हुई और उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस नहीं मिली। कुलपति को अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस की लेटलतीफी को देखते हुए उनके साथ मौजूद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता हाइकोर्ट जज की कार छीनकर ले गए थे। रेलवे स्टेशन पर एंबुलेंस को लेकर गड़बड़ी इसलिए भी है, क्योंकि 108 एंबुलेंस के लिए रेलवे स्टेशन पाइंट है लेकिन एंबुलेंस यहां खड़ी नहीं होती। एंबुलेंस यहां से दूर कैप्टन रूपसिंह स्टेडियम के पास खड़ी रहती है। इसके पीछे 108 एंबुलेंस का स्टाफ यह हवाला देता है कि उन्हें रेलवे द्वारा अलग से जगह आवंटित नहीं की है। इस कारण वे स्टेशन पर खड़े नहीं होते हैं। वहीं रेलवे के अधिकारियों यही कहना रहता है कि रेलवे के पास न तो अपना सरकारी वाहन है और न ही एंबुलेंस सेवा। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग को ही सूचना दे दी जाती है। कुल मिलाकर इस टालमटोल भरे रवैये के कारण पूरी संभावना है कि आगे भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहेगी।
निजी विश्वविद्यालय के कुलपति को जब एबीवीपी के कार्यकर्ता हाइकोर्ट जज की कार में डालकर ले गए, तो पुलिस ने तत्काल ही छात्रों पर लूट का मामला दर्ज कर दिया था। इसके पीछे हवाला दिया गया कि छात्रों ने कार के चालक से छीना झपटी की थी, जबकि जज स्वयं ही अपनी कार देने को तैयार थे। यह मामला प्रदेशभर में चर्चा में रहा था। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसके लिए मुख्य न्यायाधिपति जबलपुर को पत्र लिखा था, जबकि मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने पुलिस महानिदेशक को इस मामले की पुन: जांच के आदेश दिए थे। छात्र हिमांशु श्रोत्रिय और सुकृत शर्मा को आरोपी बनाया गया था, जिन्हें बाद में हाइकोर्ट से जमानत मिली।
मृतक युवक अमन के पिता राज कपूर ने नईदुनिया संवाददाता से बातचीत में बताया कि जैसे ही अमन के बेहोश होने की सूचना मिली, वे तत्काल ही मामा का बाजार स्थित घर से स्टेशन के लिए निकले। वे लश्कर की तंग गलियों और जाम से होते हुए स्टेशन तक पहुंच गए, लेकिन तब तक एंबुलेंस नहीं पहुंची। रेलवे के अधिकारी भी कोई सहायता करने के बजाय एंबुलेंस का इंतजार करते रहे। एंबुलेंस नहीं आई, तो निजी टैक्सी में बैठाकर वे अपने बेटे को अस्पताल लेकर पहुंचे। तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। उन्होंने रेलवे और 108 एंबुलेंस की लापरवाही के कारण अपने बेटे की जान जाना बताया।