सिंधिया-आंग्रे परिवार विवाद... हिरण्यवन कोठी की 106 साल पुरानी शिवाजी प्रतिमा पर सुनवाई टली, केस का नंबर न आने से टला फैसला
आंग्रे परिवार ने हाई कोर्ट में आवेदन दिया है कि प्रतिमा को हड़बड़ी में हटाने के लिए घोड़े के पैर तक काट दिए गए और उसे जयविलास पैलेस ले जाया गया।
Publish Date: Tue, 27 Oct 2026 10:17:26 AM (IST)Updated Date: Tue, 27 Oct 2026 10:27:43 AM (IST)
HighLights
- छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा हटाने के लिए काटे गए घोड़े के पैर
- प्रसिद्ध मूर्तिकार करमरकर ने बनाई थी यह ऐतिहासिक प्रतिमा
- मामला लिस्ट में होने के बाद भी हाईकोर्ट में नहीं हो सकी सुनवाई
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। सिंधिया-आंग्रे परिवार का दशकों पुराना संपत्ति विवाद में एक नया मोड़ आया है। पहले नौ एकड़ में फैली हिरण्यवन कोठी को लेकर विवाद था, लेकिन अब वहां स्थापित छत्रपति शिवाजी महाराज की लगभग 106 साल पुरानी प्रतिमा को लेकर नया मामला सामने आया है।
106 साल पुरानी प्रतिमा हटाने के लिए घोड़े के पैर तक काट दिए
आंग्रे परिवार ने हाई कोर्ट में आवेदन दिया है कि प्रतिमा को हड़बड़ी में हटाने के लिए घोड़े के पैर तक काट दिए गए और उसे जयविलास पैलेस ले जाया गया। चित्रलेखा आंग्रे और तुलाजी आंग्रे ने ज्योतिरादित्य सिंधिया व अन्य खिलाफ चल रहे मामले में यह आवेदन दिया है। इस मामले में सोमवार को सुनवाई भी होनी थी, लेकिन केस का नंबर नहीं आ सका।
मूर्तिकार विनायक पी. करमरकर ने यह बनाई थी प्रतिमा
आंग्रे परिवार की ओर से दिए गए आवेदन में बताया गया है कि प्रसिद्ध मूर्तिकार विनायक पी. करमरकर ने यह प्रतिमा बनाई थी। संभाजी राव आंग्रे इसे महाराष्ट्र के अलीबाग से ग्वालियर लाए और बसंत विहार व चेतकपुरी के बीच स्थित हिरण्यवन कोठी परिसर में पत्थर के चबूतरे पर स्थापित कराया।
आंग्रे परिवार का कहना है कि उनके पूर्वज छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना में नेवी कमांडर थे। इसलिए प्रतिमा से परिवार का भावनात्मक जुड़ाव है।
इसके अलावा कोठी से प्राचीन वस्तुएं और अन्य कीमती सामान हटाने, पुरानी बाउंड्री की जगह पर दीवार बनाकर नया लोहे का गेट लगाने जैसे आरोप भी लगाए गए हैं। परिवार की मांग है कि इस प्रतिमा को वापस कोठी में स्थापित कराया जाए।
43 साल से चल रहा है विवाद
हिरण्यवन कोठी को लेकर आंग्रे परिवार और सिंधिया पक्ष के बीच कानूनी विवाद करीब चार दशक से अधिक समय से चल रहा है।
- 13 अगस्त 1983: आंग्रे परिवार ने कोठी से जबरन बेदखल किए जाने का आरोप लगाया।
- 19 जुलाई 1985: जिला न्यायालय ने कोठी के लिए रिसीवर नियुक्त किया।
- 10 फरवरी 2005: जिला न्यायालय ने आंग्रे पक्ष के मुकदमे में राहत दी।
- वर्ष 2005: ज्योतिरादित्य सिंधिया और अन्य ने जिला न्यायालय के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी।
- 24 अगस्त 2026: आंग्रे परिवार ने प्रतिमा और कोठी की पूर्व स्थिति बहाल कराने के लिए हाई कोर्ट में आवेदन प्रस्तुत किया
- 26 अक्टूबर 2026: इस मामले की सुनवाई होनी थी, लेकिन केस का नंबर नहीं आने से सुनवाई टल गई।