
- बुधवार को मनाई जायेगी भैरव अष्टमी
Kaal Bhairav Ashtami 2022: ग्वालियर (नईदुनिया प्रतिनिधि) सनातन परंपरा में भैरव जी की पूजा का विशेष धार्मिक महत्व है। मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को काल भैरव की जन्मतिथि के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व 16 नवंबर को मनाया जाएगा। भैरव जयंती को काल भैरव अष्टमी, कालाष्टमी जैसे नामों से भी जाना जाता है। अष्टमी तिथि पर काल भैरव की उत्पत्ति हुई थी। शिव से उत्पत्ति होने के कारण इनका जन्म माता के गर्भ से नहीं हुआ। इसलिए अजन्मा कहा जाता है।
ज्योतिषाचार्य डॉं सतीश सोनी के अनुसार काल भैरव की पूजा से व्यक्ति को भय नहीं सताता। इनकी पूजा से जातकों के सभी तरह के पाप नष्ट होते हैं। पापी ग्रह यानी शनि और केतु, राहु के दुष्प्रभाव से मुक्ति के लिए काल भैरव की आराधना होती है। अतः जिन जातकों की जन्मपत्रिका में शनि, मंगल, राहु तथा केतु आदि पाप ग्रह अशुभता के कारण हो तथा नीच गत अवस्था में शनि की साढ़े साती या ढैया से पीड़ित हैं। उन्हें इमरती मंगौड़ी के भोग के साथ फल, नारियल आदि भैरव जी को चढ़ाना चाहिए। वही भैरव अष्टमी के दिन शमी वृक्ष के नीचे लोहे के दीपक में सरसों का तेल भरकर दीप प्रज्वलित करना चाहिए।
बुधवार को 5:49 मिनट से शुरु होगी भैरव अष्टमी
ज्योतिषाचार्य सुनील चोपड़ा ने बताया कि बाबा भैरव को शिव जी का अंश माना जाता है, यह भोलेनाथ के पांचवे अवतार हैं। भैरव के दो स्वरूप हैं एक बटुक भैरव, जो शिव के बालरूप माने जाते हैं। यह सौम्य रूप में प्रसिद्ध है। वहीं दूसरे हैं काल भैरव जिन्हें दंडनायक माना गया है। अनिष्ट करने वालों को काल भैरव का प्रकोप झेलना पड़ता लेकिन जिस पर वह प्रसन्न हो जाए उसके कभी नकारात्मक शक्तियों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।अष्टमी तिथि का प्रारंभ 16 नवंबर पूर्वाह्न 05:49 बजे से अष्टमी तिथि की समाप्ति 17 नवंबर पूर्वाह्न 07:57 बजे होगी।