
ग्वालियर, नईदुनिया प्रतिनिधि। ग्वालियर का दुर्ग इतिहास के सैकड़ों-हजारों पन्नों को अपने आप में समेटे हुए है। कदम-कदम पर नजर आने वाले स्थलों में शामिल मानसिंह पैलेस तोमर राजवंश की कहानी बयां करता है। इस पैलेस का निर्माण 15वीं शताब्दी में राजा मानसिंह तोमर ने कराया था। गुजरे हुए इतिहास के अनुसार राजवंशों के बाद मानसिंह पैलेस पर राजपूतों का राज रहा। इनके बाद मुगल और फिर मराठाओं ने शासन किया। ब्रिटिश हुकूमत खत्म होने के बाद मानसिंह पैलेस की बागडोर सिंधिया राज परिवार ने संभाली। ग्वालियर दुर्ग घूमने के लिए पहुंचने वाले विदेशी सैलानियों के बीच मानसिंह पैलेस आकर्षण का केंद्र रहता है। बताया जाता है इस पैलेस पर की गई कारीगरी मनमोह लेती है। इसे देखने पर जहन में कई सवाल दौड़ने लगते हैं। हर सैलानी राजा रजवाड़ों के शासन की कल्पना करने लगता है। इतिहासकार बताते हैं कि ग्वालियर का दुर्ग उथल-पुथल भरे युग का गवाह रहा है।
महल के अंदर है कारागृहः मानसिंह पैलेस के अंदर एक कारागृह भी है। यहां पहले किसी को जाने की अनुमति नहीं थी। टूरिस्ट गाइड पुनीत शर्मा के अनुसार बात मुगल शासनकाल की है, इसी कारागृह में मुगल शासक औरंगजेब ने अपने भाई मुराद को कैद करके रखा था। कुछ दिनों में बाद उसे यहीं मौत के घाट उतार दिया था। माना जाता है औरंगजेब को अपने भाई मुराद से खतरा था। उसे लगता था मुराद उसकी गद्दी छीन कर उसे बंदी बना लेगा, फिर उसकी हत्या कर देगा। ऐसा मुगल शासकों के साथ हो भी चुका था। इस संबंध में कई वीडियो बनाए गए हैं, जिन्हें आसानी से इंटरनेट मीडिया पर खोजकर देखा जा सकता है। इस पैलेस को दूर-दूर से देखने के लिए सैलानी दुर्ग पहुंचते हैं। कुछ तो सात समंदर पार तक के रहते हैं।
ऐसे पहुंचते हैं सैलानी ग्वालियरः ग्वालियर में स्थित धरोहर को देखने के लिए सैलानी रेल मार्ग से आते हैं। इसके अलावा दिल्ली, भोपाल, इंदौर और मुंबई से हवाई सेवा भी उपलब्ध है।
बड़े शहरों से ग्वालियर की दूरी
-327 किमी. नई दिल्ली
-430 किमी. भोपाल
-1080 किमी. मुंबई
-1867 किमी. चेन्नई
-1261 किमी. कोलकाता
( अगर कोई सैलानी बाया रोड आता है तो)
300 फीट ऊंचा है पैलेसः मानसिंह पैलेस 300 फीट उंचा है। इसके बाहर और अंदर के हिस्से में नीली, पीली, हरी, सफेद टाइल्स से बनी कलाकृतियां हैं। महल में कुल चार तल हैं। तीसरी मंजिल में कई कक्ष और दो आंगन बनाए गए हैं। जालीदार दीवारों से बना संगीत कक्ष पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। आइआइटीटीएम के असिस्टेंट प्रोफेसर प्रो. चंद्रशेखर बरुआ के अनुसार राजा मानसिंह परिवार की महिलाएं यहां बैठकर संगीत की शिक्षा लिया करती थीं। कक्ष की बनावट और साथ में दीवारों पर की गई कारीगरी 15 शताब्दी की कला का प्रतिनिधित्व करती है।