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Gwalior: भारत ही नहीं बल्कि खाड़ी पूर्व मध्य एशियाई देशों में महक रहा अंचल का बासमती, जीआई टैग न मिलने से छिन रही पहचान

ग्वालियर की एक नई पहचान अंचल की उपजाऊ मिट्टी में पैदा होने वाला सुगंधित बासमती चावल बन चुका है।

By Anil TomarEdited By: Nitin Kumar
Publish Date: Thu, 17 Sep 2026 10:27:28 AM (IST)Updated Date: Thu, 17 Sep 2026 10:34:20 AM (IST)
Gwalior: भारत ही नहीं बल्कि खाड़ी पूर्व मध्य एशियाई देशों में महक रहा अंचल का बासमती, जीआई टैग न मिलने से छिन रही पहचान
खाड़ी पूर्व मध्य एशियाई देशों में महक रहा ग्वालियर का बासमती, नईदुनिया

HighLights

  1. खाड़ी देशों में महक रहा अंचल का बासमती
  2. जीआई टैग नहीं मिलने से छिन रही पहचान
  3. जीआई टैग मिलने से होगी दोगुनी पैदावार

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। ग्वालियर अपनी ऐतिहासिक धरोहरों, भव्य किलों और संगीत परंपरा के लिए तो विश्वभर में प्रसिद्ध है ही, लेकिन अब इसकी एक नई पहचान अंचल की उपजाऊ मिट्टी में पैदा होने वाला सुगंधित बासमती चावल बन चुका है।

ग्वालियर में उत्पादित होने वाले बासमती चावल की महक केवल देश के राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि खाड़ी देशों और पूर्व मध्य एशियाई देशों के रसोईघरों को भी सुगंधित कर रही है। पकने के दौरान इसकी अनूठी और प्राकृतिक खुशबू ही इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खास बनाती है।


जिले में बासमती विशेषकर पूसा 1121 और 1509 किस्म का उत्पादन किया जाता है। हालांकि, जिले के पास इस चावल के लिए जीआई टेग नहीं है। इसलिए यह चावल जिले की अधिक पहचान नहीं बना पा रहा है।

60 फीसदी भूमि पर होती है खेती

करीब 60 हजार हेक्टेयर में सिर्फ बासमती, दो लाख मीट्रिक टन उत्पादन कृषि विशेषज्ञों और जिला प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार, ग्वालियर जिले में इस वर्ष कुल एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की रोपाई की गई है।

इसमें से करीब 60 प्रतिशत हिस्सा यानी लगभग 60 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में केवल बासमती चावल की किस्मों का उत्पादन किया जा रहा है। अंचल में अनुकूल जलवायु, सिंचाई के पर्याप्त साधनों और मिट्टी की उर्वरता के कारण हर साल औसतन दो लाख मीट्रिक टन बासमती धान का उत्पादन होता है।

यहां पैदा होने वाले बासमती चावल के दाने लंबे, चमकीले और पकाने पर बिखरने वाले होते हैं, जिसकी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी भारी मांग रहती है।

पकने के दौरान ही नहीं, खेत के पास से निकलने पर आती है खुशबू ऐसा नहीं है कि बासमती चावल केवल पकने के दौरान ही अपनी खुशबू देता है, बल्कि यदि जिस खेत में बासमती धान होता है उसके पास से गुजरने पर से खुशबू आने लगती है।

इससे आसानी से पहचाना जा सकता है कि किस खेत में बासमती धान है। डबरा व भितरवार क्षेत्र में इस किस्म के धान का उत्पादन सबसे अधिक होता है। जीआइटैग की कमी बनी सबसे बड़ी रुकावट अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग और निर्यात की विशाल संभावनाओं के बावजूद ग्वालियर के बासमती को उसकी वास्तविक ब्रांडिंग और सही पहचान नहीं मिल पा रही है।

जीआई टैग नहीं मिलने से परेशानी

इसकी मुख्य वजह इसे जीआई टैग न मिलना है। जीआई टैग न होने के कारण ग्वालियर के किसान और स्थानीय व्यापारी अपने इस प्रीमियम चावल को ग्वालियर बासमती के अपने स्वतंत्र ब्रांड नाम से वैश्विक बाजार में सीधे ऊंचे दामों पर नहीं बेच पाते।

पंजाब, हरियाणा और अन्य जीआई टैग प्राप्त राज्यों के निर्यातक ग्वालियर की मंडियों से कम दामों पर बासमती खरीदकर ले जाते हैं और प्रोसेसिंग के बाद अपने टैग के साथ खाड़ी व यूरोपीय देशों में महंगे दामों पर निर्यात करते हैं।

किसानों को चाहिए सरकारी प्रोत्साहन

ग्वालियर-चंबल अंचल के किसानों का कहना है कि यदि राज्य सरकार और कृषि विभाग मिलकर ग्वालियर के बासमती को जीआई टैग दिलाने के लिए मजबूत पैरवी करें, तो अंचल के किसानों की आय में कई गुना वृद्धि हो सकती है। फिलहाल, जीआई टैग की लड़ाई अदालती और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अटकी होने के कारण किसानों को अपनी मेहनत का पूरा हक नहीं मिल पा रहा है।

जिले में एक लाख हेक्टेयर में धान रोपा गया है। इसमें डबरा व भितरवार क्षेत्र में अधिकतर किसान बासमती की ही रोपाई करते हैं। यहां के बासमती चावल की पहचान ही इसकी खुशबू है। यह अन्य चावल की तुलना में महंगा होता है और ग्वालियर से देश विदेश में चावल निर्यात किया जाता है। भानु प्रकाश शर्मा, उप संचालक, कृषि