
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी व्यक्ति ने फर्जी दस्तावेज या गलत जानकारी देकर सरकारी नौकरी हासिल की है, तो उसे कानून का संरक्षण नहीं मिल सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी करके प्राप्त की गई नियुक्ति या कोई भी आदेश शुरू से ही अवैध माना जाएगा। यह फैसला एक सरकारी कर्मचारी की नियुक्ति से जुड़े मामले में सुनाया गया।
इसमें शासन की ओर से पैरवी अधिवक्ता रविंद्र दीक्षित ने की। मामले में कर्मचारी पर आरोप था कि उसने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी प्राप्त की थी। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धोखाधड़ी हर कानूनी प्रक्रिया को खत्म कर देती है। यानी यदि किसी ने छल या जालसाजी करके लाभ लिया है, तो वह उस लाभ को बनाए रखने का अधिकार नहीं रखता।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में केवल यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि कार्रवाई से पहले संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का मौका नहीं मिला। यदि रिकॉर्ड से साफ है कि नियुक्ति फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हुई है और व्यक्ति यह नहीं बता पा रहा कि सुनवाई न मिलने से उसे क्या नुकसान हुआ, तो केवल तकनीकी आधार पर कार्रवाई रद नहीं की जा सकती।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्राकृतिक न्याय का मतलब यह नहीं है कि धोखाधड़ी करने वाले को केवल प्रक्रिया की कमी का फायदा देकर बचा लिया जाए। अदालत का उद्देश्य न्याय करना है, न कि तकनीकी खामियों के आधार पर गलत तरीके से लाभ लेने वालों को संरक्षण देना। खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति अदालत में आता है, उसे पूरी सच्चाई और सही दस्तावेजों के साथ आना चाहिए।
यदि कोई महत्वपूर्ण तथ्य या दस्तावेज छिपाया जाता है या फर्जी कागजात पेश किए जाते हैं, तो यह अदालत के साथ भी धोखा माना जाएगा। ऐसे मामलों में अदालत किसी भी आदेश को कभी भी निरस्त कर सकती है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सरकारी नौकरियों, फर्जी जाति प्रमाण-पत्र, नकली शैक्षणिक प्रमाण-पत्र और अन्य धोखाधड़ी से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि धोखाधड़ी करके हासिल किए गए अधिकार लंबे समय तक नहीं टिक सकते और कानून ऐसे लोगों को राहत नहीं देगा।