
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की अनिवार्यता को चुनौती देने वाले शिक्षक राजेश मिश्रा को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट आदेश दे चुका है। यह फैसला न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने सुनाया।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया था कि उनकी नियुक्ति टीईटी लागू होने से पहले हुई थी। इसलिए बाद में लागू हुई टीईटी की शर्त उन पर लागू नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने टीईटी पास नहीं करने के कारण नौकरी से हटाने या अनिवार्य सेवानिवृत्ति जैसी कार्रवाई नहीं करने की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें सेवा में कार्यरत शिक्षकों के लिए भी टीईटी पास करना जरूरी बताया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए टीईटी जरूरी है। हालांकि, लंबे समय से नौकरी कर रहे शिक्षकों को सुप्रीम कोर्ट ने कुछ राहत दी है। जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पांच वर्ष से कम समय बचा है, वे बिना टीईटी पास किए सेवानिवृत्ति तक नौकरी कर सकते हैं। लेकिन पदोन्नति के लिए उन्हें टीईटी पास करना जरूरी होगा।
वहीं जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पांच वर्ष से अधिक समय है, उन्हें नौकरी जारी रखने के लिए टीईटी पास करना होगा। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने टीईटी पास करने की समयसीमा बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के बाद के आदेश में भी इस व्यवस्था को खत्म नहीं किया गया है। याचिकाकर्ता का यह कहना भी सही नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षकों को इस मुद्दे पर दोबारा हाईकोर्ट आने की छूट दी है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को इस मामले में पूरी तरह लागू माना और राजेश मिश्रा की याचिका खारिज कर दी।
यह भी पढ़ें- MP में 1 नवंबर से पेपरलेस होंगे अस्पताल... मोबाइल पर मिलेगा OPD पर्चा, बिना पूरी तैयारी व्यवस्था पर उठे सवाल