फिर गड्ढे में आस्था का विसर्जन... हर साल बनता है अस्थाई कुंड, ग्वालियर में 5 साल से गणेश सरोवर की मांग अधूरी
प्रशासन ने इस वर्ष सागरताल रोड पर करीब 18 फीट गहरे गड्ढे को जलाशय का रूप देकर अस्थायी विसर्जन की व्यवस्था की है। व्यवस्था भले ही तत्काल समस्या का समाध...और पढ़ें
Publish Date: Tue, 22 Sep 2026 06:21:07 PM (IST)Updated Date: Tue, 22 Sep 2026 06:27:29 PM (IST)
सागरताल रोड पर बनाएं गए अस्थाई गड्ढे में श्रीजी को विसर्जन के लिए जे जाते लोग। नईदुनियाHighLights
- गणेश उत्सव खत्म होते ही पीछे छूट जाता है मुद्दा
- सागरताल बंद होने से श्रद्धालुओं के सामने जल संकट
- पर्यावरण के नाम पर पाठ, लेकिन विसर्जन की पक्की व्यवस्था नहीं
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। डोल एकादशी से गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन शुरू हो गया है। जिला प्रशासन ने सागरताल रोड पर अस्थाई गड्ढे का निर्माण कर प्रतिमाओं के विसर्जन की व्यवस्था की है। सनातनी जब मंगलवार को परंपरा के अनुसार जब आस्था और श्रद्धा के साथ गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन करने पहुंचे तो वह व्यथित नजर आए। उनका एक ही सवाल था कि आखिर कब तक अस्था विसर्जन गड्ढे में किया जायेगा। कब गणेश सरोबर का निर्माण कराने के लिए निर्वाचित प्रतिनिधि और प्रशासन जागेगा।
गणेशोत्सव समाप्त होते ही यह मुद्दा छूट जाता है पीछे
प्रशासन ने इस वर्ष सागरताल रोड पर करीब 18 फीट गहरे गड्ढे को जलाशय का रूप देकर अस्थायी विसर्जन की व्यवस्था की है। व्यवस्था भले ही तत्काल समस्या का समाधान करती दिखाई दे, लेकिन पांच वर्ष से उठ रही स्थायी गणेश सरोवर की मांग अब भी अधूरी है। हर साल प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की ओर से स्थायी समाधान की बात होती है, लेकिन गणेशोत्सव समाप्त होते ही यह मुद्दा भी पीछे छूट जाता है।
नवरात्र पर विराजित होने वाली आदिशक्ति का विसर्जन भी इसी गड्ढे को थोड़ा बहुत साफ कराया जायेगा। वरिष्ठ समाजसेवी रामबाबू कटारे पिछले पांच वर्षों से लगातार जनप्रतिनिधियों को मांग पत्र सौंप रहे हैं, लेकिन अब तक समाधान नहीं हो पाया है।
सागरताल में होता था विसर्जन
सागरताल में पहले गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन होता था। फिलहाल सौंदर्यीकरण और अन्य कार्यों के कारण सागरताल में पर्याप्त पानी नहीं है। ऐसे में श्रद्धालुओं के सामने प्रतिमा विसर्जन के साथ मोर छठ और तर्पण जैसे धार्मिक कार्यों के लिए भी उचित स्थान का संकट बना हुआ है। शहर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु इन परंपराओं को निभाते हैं, लेकिन स्थायी जलस्रोत नहीं होने के कारण उन्हें अलग-अलग स्थानों पर भटकना पड़ता है।
अस्थाई गड्ढे के स्थान पर स्थायी जलाशय क्यों नहीं
इस वर्ष सागरताल रोड पर बनाए गए अस्थायी जलाशय में गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन की व्यवस्था की गई है। करीब 18 फीट गहरे गड्ढे को पानी से भरकर इसे विसर्जन स्थल का स्वरूप दिया गया है। हालांकि सवाल यह है कि क्या हर वर्ष इसी तरह गड्ढे को जलाशय में बदलकर समस्या का समाधान किया जाता रहेगा या शहर को वास्तव में अपना गणेश सरोवर मिलेगा। इसी स्थान पर सुंदर जलाशय का निर्माण कराने की पहल जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधि क्यों नहीं करते हैं।
यहां भी कराया जा सकता है विसर्जन
जब तक श्री गणेश व आदिशक्ति की प्रतिमाओं के सम्मान पूर्वक विसर्जन की व्यवस्था नहीं होती है, तब तक जनकताल में इन प्रतिमाओं का विसर्जन कराया जा सकता है। नगर निगम जितना पैसा अस्थाई गड्ढे को तैयार करने में करता है, उतने पैसे से विसर्जन के बाद जनकताल की सफाई भी कराई जा सकती है।
सिंधी समाज ने स्विमिंग पुल में किया भगवान झूलेलाल की प्रतिमा का विसर्जन
चालीहा पर्व 40 दिन तक वरुणावतार भगवान झूलेलाल की प्रतिमा के आराधना करने के बाद सिंधी समाज को भी प्रतिमा का विसर्जन गिरवाई पर एक स्विमिंग पुल में करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
अब तो ऐसा लगने लगा है कि हम अपनी देवभूमि पर नहीं विदेशी धरती पर वास कर रहे हैं। क्योंकि हमारी सनातनी परंपराओं को समाप्त करने का षड्यंत्र सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है। विदेशों में भी वहां सरकारें सनातन धर्म की परंपराओं के निर्वहन करने के लिए स्थायी व अस्थायी व्यवस्था कर देती हैं। सागरताल जीणोद्धार के नाम पर बंद होने के बाद श्रीगणेश व आदिशक्ति की प्रतिमाओं के सम्मान पूर्वक विसर्जन की कोई व्यवस्था नहीं की जा रही है। सबसे बड़ी बात इस शहर के धर्म गुरु और भागताचार्य भी खामोश हैं। गणेश सरोबर के लिए केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को मांग पत्र दे चुके हैं, प्रभारी मंत्री को डाक से भेज चुके हैं, लेकिन सब खामोश हैं, बस सनातनियों को पर्यावरण के नाम पर नए-नए पाठ पढ़ाए जाते हैं। होली पर पानी बहाओ, गमलों में करो विसर्जन, दीपावली पर पटाखे मत चलाओ। नगर में एक सरोबर का निर्माण होना ही चाहिए। - पं रामबाबू कटारे, समाजसेवी
लज्जाजनक है कि हम लोग अपनी आस्थाओं का विसर्जन एक गड्ढे में कर रहे हैं। प्रशासन व जनप्रतिनिधियों को देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए कोई स्थायी व्यवस्था करनी चाहिए। जहां सनातनी अपनी परंपराओं का निर्वहन कर सकें। हाल ही महिलाओं को भुजरियां कटोराताल की बाउंड्री जल के छीटें मारकर विसर्जित करते देखकर मन व्यथित हुआ। क्या हम लोग इतने लाचार और विवश हैं कि अपनी आस्थाओं के सम्मान के लिए कोई स्थायी व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। प्रशासन व जनप्रतिनिधियों को गंभीरता से इस पर विचार करना चाहिए। - संत रामसेवक दास महाराज, पीठाधीश्वर गंगादास की बड़ी शाला