नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। फर्जी दुष्कर्म का मामला दर्ज करवाने और फिर कोर्ट में झूठी गवाही देने वाली महिला की सजा को जिला कोर्ट ने कम कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि कठोर सजा से ज्यादा जरूरी होता है सुधार की संभावना को देखना। निचली अदालत द्वारा दी गई तीन साल की सजा को कोर्ट ने कम करते हुए केवल न्यायालय उठने तक की सजा और दो हजार रुपये का जुर्माना कर दिया है। दरअसल, युवती के पिता ने चार सितंबर 2013 को विश्वविद्यालय थाना में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उनकी बेटी लापता है।
10 अप्रैल 2014 को युवती को पुलिस ने बरामद किया। युवती ने बयान दिया कि आरोपित वीरा उर्फ वीर सिंह परिहार और मुन्नी देवी ने उसे बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गए और वीर सिंह ने उसके साथ दुष्कर्म किया। पुलिस ने दुष्कर्म का केस दर्ज कर लिया और मामला अदालत में पहुंचा। लेकिन सुनवाई के दौरान युवती ने बयान पलट दिए और कहा कि वह आरोपितों को जानती तक नहीं। उसने बताया कि भाभी से झगड़े के कारण वह घर छोड़कर खुद चली गई थी।
युवती की गवाही बदलने पर अदालत ने आरोपितों को बरी कर दिया, लेकिन युवती पर झूठी गवाही देने का मामला दर्ज किया गया। इस मामले में विचारण न्यायालय ने 25 अप्रैल 2025 को युवती को तीन साल के सश्रम कारावास और 500 के जुर्माने की सजा सुनाई। युवती ने इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की। जिसमें कोर्ट ने उसे राहत देते हुए कहा कि महिला का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और बीते 10 वर्षों से वह मानसिक, सामाजिक और न्यायिक दबाव झेल रही है। इसलिए उसे सिर्फ कोर्ट उठने तक की सजा दी गई।