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110 साल से 'तिघरा डैम' में जिंदा है सर विश्वेश्वरैया की इंजीनियरिंग; बिना बिजली के खुद खुलते थे 64 ऑटोमेटिक गेट

तत्कालीन सिंधिया रियासत के महाराज माधवराव सिंधिया के आग्रह पर मैसूर रियासत के चीफ इंजीनियर विश्वेश्वरैया ने इस बांध की डिजाइन और निर्माण में महत्वपूर्...और पढ़ें

By Priyank SharmaEdited By: Rajdil Shivhare
Publish Date: Mon, 14 Sep 2026 04:41:23 PM (IST)Updated Date: Mon, 14 Sep 2026 04:42:35 PM (IST)
110 साल से 'तिघरा डैम' में जिंदा है सर विश्वेश्वरैया की इंजीनियरिंग; बिना बिजली के खुद खुलते थे 64 ऑटोमेटिक गेट
लबालब तिघरा बांध का फाइल फोटो।

HighLights

  1. 1 लाख की आबादी के लिए बना बांध, आज बुझा रहा 17 लाख की प्यास
  2. विश्वेश्वरैया की पेटेंट तकनीक खास, पानी के दबाव से संचालित होते थे गेट
  3. द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में तिघरा जलाशय में उतरते थे सी-प्लेन

प्रियंक शर्मा, नईदुनिया, ग्वालियर। कभी सिर्फ एक लाख की आबादी की प्यास बुझाने के लिए बनाया गया तिघरा बांध आज करीब 17 लाख ग्वालियरवासियों के लिए जीवनरेखा बना हुआ है। 110 साल पहले तैयार हुए इस बांध की इंजीनियरिंग आज भी हैरान करती है। भारत में आधुनिक इंजीनियरिंग के पितामह माने जाने वाले भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ने तिघरा में ऐसे 64 फ्लड गेट लगाए थे, जो जलाशय में पानी का दबाव बढ़ने पर अपने आप खुल जाते थे। उनकी यह तकनीक इतनी अनोखी थी कि बाद में इसे विश्वेश्वरैया गेट के नाम से पेटेंट भी कराया गया।

वर्ष 1906 में शुरू हुआ तिघरा का निर्माण 1916 में हुआ था पूरा

वर्ष 1906 में शुरू हुआ तिघरा बांध का निर्माण 1916 में पूरा हुआ था। करीब 24 मीटर ऊंचे और 1341 मीटर लंबे इस बांध की जलसंग्रहण क्षमता 4.8 मिलियन क्यूबिक फीट बताई जाती है। तत्कालीन सिंधिया रियासत के महाराज माधवराव सिंधिया के आग्रह पर मैसूर रियासत के चीफ इंजीनियर विश्वेश्वरैया ने इस बांध की डिजाइन और निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।


उस दौर में इतनी बड़ी जल संरचना तैयार करना अपने आप में इंजीनियरिंग की बड़ी उपलब्धि थी। तिघरा के पुराने 64 गेटों की सबसे बड़ी खासियत उनका स्वचालित संचालन था। ये गेट आठ कुएंनुमा जल संरचनाओं से जुड़े थे।

वर्तमान में 7 रेडियल गेटों से होती है पानी की निकासी

जलाशय में पानी का स्तर और दबाव बढ़ने पर इन संरचनाओं में पानी भरता था और निर्धारित दबाव बनने पर एक साथ आठ गेट खुल जाते थे। इस व्यवस्था के लिए उस समय किसी आधुनिक मोटर या बिजली की जरूरत नहीं पड़ती थी। बाद के वर्षों में इस व्यवस्था की कार्यप्रणाली को समझना मुश्किल साबित हुआ। यही वजह रही कि पुराने गेटों को वेल्डिंग कर स्थायी रूप से बंद कर दिया गया।

इसके बाद 16 जंक्शन गेट लगाए गए, लेकिन उनसे अपेक्षित क्षमता से पानी की निकासी नहीं हो सकी। वर्तमान में बांध में पानी की निकासी के लिए सात रेडियल गेटों का इस्तेमाल किया जाता है, जिन्हें मोटर की मदद से संचालित किया जाता है। पुराने विश्वेश्वरैया गेट हालांकि आज भी तिघरा की इंजीनियरिंग विरासत के रूप में मौजूद हैं।

बांध बना था छोटा, जिम्मेदारी बढ़ती गई

  • तिघरा के निर्माण के समय ग्वालियर की आबादी आज की तुलना में बहुत कम थी। बांध को लगभग एक लाख लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था, लेकिन एक सदी से ज्यादा समय में शहर की आबादी कई गुना बढ़ गई।
  • आज यही बांध ग्वालियर की लगभग 17 लाख की आबादी के लिए पेयजल व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है यानी जिस जल संरचना की कल्पना एक सदी पहले छोटी आबादी के लिए की गई थी, वह आज भी बढ़ते शहर की प्यास बुझाने में अपनी भूमिका निभा रही है।
  • बदलते समय के साथ बांध की संचालन व्यवस्था और शहर की जल जरूरतें जरूर बदलीं, लेकिन तिघरा की मूल इंजीनियरिंग आज भी इसकी पहचान बनी हुई है।

जब तिघरा पर उतरते थे सी-प्लेन

तिघरा का इतिहास केवल पानी और इंजीनियरिंग तक सीमित नहीं है। कभी यहां सी-प्लेन भी उतरते थे। वर्ष 1937 में ग्वालियर से आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड तक विमान सेवा की नियमित व्यवस्था शुरू हुई थी। इसके संचालन और संधारण के लिए माधव मेरिनोड्रम की स्थापना की गई थी तथा इंपीरियल एयरवेज के माध्यम से सेवा संचालित होती थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1942 से 1945 के बीच विमान सेवा बंद कर दी गई।

हालांकि ब्रिटिश वायुसेना के विमानों को उस दौर में ईंधन और रसद की जरूरत पड़ती थी। इसके लिए सी-प्लेन तिघरा जलाशय में उतरते और यहां से ईंधन लेते थे। उस समय ग्वालियर के नगर सेठ लाला भिखारीदास और लाला काशीनाथ वैश्य का पेट्रोलियम कारोबार था और उनके माध्यम से इन विमानों को ईंधन उपलब्ध कराया जाता था।