अजय उपाध्याय. ग्वालियर। कक्षा में छात्रों की झिझक उन्हें पढ़ाई में कमजोर बनाती है। उनकी यह झिझक को तोड़ने व होशियार छात्रों के बराबर तैयार करने के लिए अतिरिक्त क्लास लेती हूं। मैं अपने बचपन को याद करती हूं जब कक्षा में समझ न आने पर भी शिक्षक के डर से सिर हिलाकर हां में जवाब देती थी, लेकिन मैंने समझा कि यदि शिक्षक व छात्र के बीच का रिश्ते में कोई झिझक न हो तो कक्षा का कोई भी छात्र कमजोर नहीं रहेगा। शिक्षक दिवस पर यह कहना था कि जीआर मेडिकल कालेज के प्रिवेंटिव एंड सोशल मेडिसिन की विभागाध्यक्ष डा रंजना तिवारी का। वह कहती हैं कि समय पर ईमानदारी से किया गया कार्य आपको जीवन में हमेशा आगे लेकर जाता है। शिक्षक का दायुत्व है कि वह विद्यार्थी को ज्ञानवान बनाए। यदि किसी छात्र की समझ नहीं आता तो वह बिना झिझक के मुझसे पूछता है और मैं उसे क्लास के अतिरिक्त समय देकर पढ़ाकर उसकी कमजोरी को दूर करती हूं। पांच सितंबर को डा सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म दिन के रूप में शिक्षक दिवस 1962 से मनाया जा रहा है।
भाषा की परेशानी विद्यार्थी की कमजोरी न बने: डा अजीत सिंह राजपूत
जीआरएमसी के फिजियोलोजी विभागाध्यक्ष डा अजीत सिंह राजपूत का कहना है कि मैं जब मेडिकल की पढ़ाई करने आया था तो मेरे सामने सबसे बड़ी समस्या भाषा की थी। मैं हिन्दी भाषा में पढ़ा हुआ छात्र था और यहां पर क्लास में अंग्रेजी में पढ़ाते थे, किताबें भी अंग्रेजी में थी। क्लास में शिक्षक ने क्या पढ़ाया समझ ही नहीं आता था। तब मुझे क्लास के बाहर काफी मेहनत करनी पड़ती थी। जब मैं शिक्षक बना तो मैंने ठान लिया था कि जिस समस्या को मैंने भुगता वह हमारे विद्यार्थी नहीं भुगतेंगे। मैं फिजियोलोजी की पढ़ाई हिन्दी व अंग्रेजी दोनों माध्यम से कराता हूं जिससे सभी छात्रों को समझ आ सके।
बचपन की झिझक ने बनाया मुझे शिक्षक: डा. रंजना तिवारी
जीएमसी के पीएसम विभागाध्यक्ष डा रंजना तिवारी का कहना है कि बचपन में क्लास में मुझे शिक्षक से कुछ भी पूछने पर झिझक होती थी। इसलिए मैं घर आकर माता पिता से परेशानी का समाधान कराती थी। जब मैं शिक्षक बनी तो मैंने ठान लिया कि विद्यार्थी व शिक्षक के बीच का रिश्ता ऐसा हो कि विद्यार्थी को शिक्षक से किसी भी प्रकार की झिझक न रहे। इसलिए मैं विद्यार्थियों के साथ हंसखेलकर उन्हें पढ़ाती हूं जिससे वह अच्छे से समझ सकें। यही कारण है कि विद्यार्थी क्लास के बाद भी मेरे पास अतिरिक्त क्लास लेते हैं।
छात्र की परेशानी को समझने वाला ही सच्चा गुरु: डा. सुधीर
आरएमसी के एनाटोमी विभागाध्यक्ष डा सुधीर सक्सेना का कहना है कि छात्र की परेशानी को जिस शिक्षक ने समझ लिया। वह सच्चा गुरु है, क्योंकि शिक्षक और छात्र का रिश्ता पालक का होता है। एक बालक अपनी परेशानी माता पिता से कहने में नहीं झिझकता, उसी प्रकार वह अपने शिक्षक से व्यवहार करता है तो फिर वह पढ़ाई में कमजोर नहीं रह सकता। मैं भी वही करता हूं क्योंकि प्रथम वर्ष के छात्रों में काफी झिझक होती है। जिन्हें पढ़ाने के साथ उनकी हर परेशानी में मदद करने पर वह आपके साथ परिवार के सदस्य बन जाते हैं।