जेसी मिल की 22.597 हेक्टेयर जमीन की नीलामी पर रोक, ग्वालियर हाई कोर्ट ने कहा- सिविल कोर्ट करेगा स्वामित्व का फैसला
इस जमीन पर केंद्र सरकार के कस्टम विभाग और मध्य प्रदेश सरकार दोनों ने अपना दावा किया है।
Publish Date: Fri, 18 Sep 2026 06:12:15 PM (IST)Updated Date: Fri, 18 Sep 2026 06:13:15 PM (IST)
HighLights
- विवादित जमीन बेचकर नहीं चुकाई जा सकेगी देनदारी
- कस्टम विभाग और मध्य प्रदेश सरकार के बीच फंसा पेंच
- 22 साल पुराने विवाद का निचली अदालत करेगी निपटारा
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। जेसी मिल की देनदारियां चुकाने के लिए गौसपुरा स्थित 22.597 हेक्टेयर विवादित जमीन की नीलामी नहीं की जा सकेगी। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह जमीन मिल की ऐसी संपत्तियों में शामिल नहीं है, जिन्हें बेचकर लेनदारों की देनदारियां चुकाई जा सकें। जमीन के वास्तविक स्वामित्व का निर्धारण अब सिविल कोर्ट में होगा। इस जमीन पर केंद्र सरकार के कस्टम विभाग और मध्य प्रदेश सरकार दोनों ने अपना दावा किया है।
कस्टम विभाग ने पुराने राजस्व रिकॉर्ड का हवाला देते हुए हाई कोर्ट में कहा कि जमीन उसके नाम भूमिस्वामी के रूप में दर्ज रही है। इसलिए इसे मप्र सरकार के नाम नहीं किया जा सकता।
वहीं, मप्र सरकार ने करीब एक सदी पुराने घटनाक्रम का हवाला देते हुए कस्टम विभाग के दावे पर सवाल उठाया। सरकार का कहना है कि जब यह जमीन जेसी मिल को दी गई थी, उस समय ग्वालियर एक रियासत थी। रियासत का ट्रेड, कस्टम और एक्साइज विभाग तत्कालीन ग्वालियर राज्य का विभाग था। इसलिए उस समय के रिकॉर्ड में कस्टम विभाग का नाम दर्ज होना मौजूदा केंद्र सरकार के स्वामित्व का स्वतः प्रमाण नहीं माना जा सकता।
2018 में ही मिल का मालिकाना दावा खारिज हो चुका
जमीन को लेकर वर्ष 2004 में कंपनी जज ने मप्र सरकार का दावा खारिज करते हुए जमीन को जेसी मिल की संपत्ति माना था। इसके बाद मामला डिवीजन बेंच में पहुंचा। वर्ष 2018 में डिवीजन बेंच ने पूर्व आदेश को पलटते हुए कहा था कि जेसी मिल इस जमीन की मालिक नहीं थी, बल्कि केवल पट्टेदार थी। मिल बंद होने के बाद जमीन मूल मालिक के पास लौट गई थी।
अब कस्टम विभाग ने पुराने राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर जमीन पर अपना अधिकार जताया है। हाई कोर्ट ने स्वामित्व के इस विवाद का अंतिम फैसला अपने स्तर पर करने के बजाय इसे सिविल कोर्ट के क्षेत्राधिकार का विषय माना है। इस स्थिति में जब तक स्वामित्व स्पष्ट नहीं होता, विवादित जमीन को जेसी मिल की संपत्ति मानकर उसकी बिक्री कर लेनदारों की देनदारी चुकाने का रास्ता नहीं अपनाया जा सकता।
22 साल में तीन बार बदली जमीन की तस्वीर
- 2004: कंपनी जज ने मप्र सरकार का दावा खारिज कर जमीन को जेसी मिल की संपत्ति माना।
- 2018: डिवीजन बेंच ने फैसला पलटते हुए कहा- जेसी मिल मालिक नहीं, केवल पट्टेदार थी। मिल बंद होने के बाद जमीन मूल मालिक को लौट गई।
- 2026: कस्टम विभाग ने पुराने राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर जमीन पर अपना दावा किया। हाई कोर्ट ने कहा- वास्तविक स्वामित्व का निर्धारण सिविल कोर्ट करेगा।