नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। सोशल मीडिया, यू-ट्यूब और डीपफेक तकनीक के दौर में अदालतों के सामने वास्तविक और कृत्रिम सामग्री में अंतर करना बड़ी चुनौती बन गया है। साक्ष्य कृत्रिम हो सकते हैं और उन्हें अदालत में पेश करने वाले भी तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसे में न्यायिक अधिकारियों को आधुनिक डिजिटल साक्ष्यों की जटिलताओं को समझना होगा।
न्यायदान केवल कानून की धाराओं का ज्ञान रखने तक सीमित नहीं
यह बात सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने शनिवार को ग्वालियर में मध्य प्रदेश राज्य न्यायिक अकादमी के क्षेत्रीय न्यायिक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में कही। उन्होंने कहा कि न्यायदान केवल कानून की धाराओं का ज्ञान रखने तक सीमित नहीं है। अदालत में न्याय की उम्मीद लेकर आने वाले व्यक्ति और उसकी वास्तविक परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है। केवल जानना अमूर्त है, जबकि समझना उस ज्ञान का वास्तविक उपयोग है।
दो दिवसीय सम्मेलन में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान हाई कोर्ट के न्यायाधीशों के साथ चारों राज्यों की न्यायिक अकादमियों के निदेशक, रजिस्ट्री अधिकारी और अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायिक अधिकारी शामिल हुए।
कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के जस्टिश प्रशांत कुमार मिश्रा। नईदुनिया
अनुभव के साथ नई परिस्थितियों को समझना जरूरी
न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि न्यायिक शिक्षा किसी निश्चित पाठ्यक्रम या सिलेबस तक सीमित नहीं हो सकती। वर्षों का अनुभव यह बताता है कि अतीत में क्या देखा गया, लेकिन वास्तविक शिक्षा यह सिखाती है कि अब तक सामने नहीं आई परिस्थितियों से कैसे निपटना है। समाज लगातार बदल रहा है, इसलिए न्यायपालिका को भी अपनी सोच और समझ का दायरा लगातार बढ़ाना होगा।
पुराने कानूनों की नई परिस्थितियों में व्याख्या
उन्होंने कहा कि अपराधी तकनीक के इस्तेमाल में अधिक सक्षम और शातिर हो रहे हैं। ऐसे में न्यायाधीशों को दशकों पुराने कानूनों की वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप व्यावहारिक व्याख्या तलाशनी होगी। उन्होंने भारतीय न्यायपालिका पर भरोसा जताते हुए कहा कि देश और समाज के सामने जब भी नई चुनौतियां आईं, न्यायपालिका ने उनका मजबूती से सामना किया है और लोकतंत्र की रक्षा में अपनी भूमिका निभाई है।
डीएनए से डिजिटल फुटप्रिंट तक पर प्रशिक्षण
सम्मेलन में न्यायिक शिक्षा को बदलती कानूनी और तकनीकी जरूरतों के अनुरूप विकसित करने पर मंथन हुआ। डीएनए रिपोर्ट, वॉयस सैंपल और डिजिटल साक्ष्यों को समझने के लिए तकनीकी प्रशिक्षण की जरूरत बताई गई।
अपराध की जांच में इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और डिजिटल फुटप्रिंट के बढ़ते महत्व के बीच इन साक्ष्यों की विश्वसनीयता समझने के लिए जांच और न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण पर भी जोर दिया गया।
न्यायिक अधिकारियों को फॉरेंसिक लैब, पुलिस जांच और जेल व्यवस्था की कार्यप्रणाली समझाने के लिए फील्ड ट्रेनिंग का सुझाव भी सामने आया। इसके अलावा न्यायिक प्रशिक्षण में निष्पक्षता, समानता, संवेदनशीलता, एथिक्स, लाजिक और सायकोलाजी को शामिल करने तथा अधिकारियों को अपने पूर्वाग्रह और सीमाओं को पहचानकर लगातार सीखने की जरूरत बताई गई।
तीनों नए आपराधिक कानूनों को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने की पहल
सम्मेलन में मध्य प्रदेश में तीनों नए आपराधिक कानूनों को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने की पहल का भी उल्लेख हुआ। न्यायिक अकादमी में पारंपरिक प्रशिक्षण के बजाय 360 डिग्री और इमर्सिव लर्निंग को बढ़ावा देने तथा वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) और मेडिएशन को मजबूत करने पर भी चर्चा हुई। कार्यक्रम में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश, मध्य प्रदेश राज्य न्यायिक अकादमी के निदेशक दिनेश चंद्र लाल सहित जिला एवं पुलिस प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।