आरटीआई मामले में केंद्रीय सूचना आयोग का आदेश हाई कोर्ट ने किया रद, 60 दिन में जानकारी देने के निर्देश
न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के की एकलपीठ के समक्ष पदम सिंह ने याचिका दायर कर 16 दिसंबर 2020 को केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी थी।
Publish Date: Tue, 14 Jul 2026 02:55:08 PM (IST)Updated Date: Tue, 14 Jul 2026 02:55:37 PM (IST)
HighLights
- सीआईसी का 'पुनः सुनवाई न होने' का तर्क खारिज
- अलग-अलग विषयों पर थीं दोनों आरटीआई
- सर्विस रिकॉर्ड नष्ट करने की नीति की मांगी थी जानकारी
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें एक आरटीआई अपील को पूर्व निर्णय के आधार पर पुनः सुनवाई न होने के सिद्धांत के आधार पर खारिज कर दिया गया था। हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई जानकारी पहले की आरटीआई से अलग थी, इसलिए अपील को इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता था।
न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के की एकलपीठ के समक्ष पदम सिंह ने याचिका दायर कर 16 दिसंबर 2020 को केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता ने आरटीआई के माध्यम से अपने सेवा अभिलेख (सर्विस रिकार्ड) नष्ट किए जाने से संबंधित रिकार्ड रिटेंशन पालिसी, रिकार्ड नष्ट करने के आदेश और उस आदेश को मंजूरी देने वाले सक्षम अधिकारी की जानकारी मांगी थी।
विषय अलग-अलग था दोनों आरटीआई का
केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी ने आरटीआई अधिनियम की धारा-24 का हवाला देते हुए जानकारी देने से मना कर दिया था। इसके बाद प्रथम अपीलीय प्राधिकारी और केंद्रीय सूचना आयोग ने भी अपील खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान माना कि पहले की आरटीआई विभागीय जांच से संबंधित अभिलेखों के बारे में थी, जबकि बाद की आरटीआई में रिकार्ड नष्ट करने की नीति, नियम, आदेश और सक्षम अधिकारी की जानकारी मांगी गई थी। इसलिए दोनों आरटीआई का विषय अलग-अलग था और पूर्व निर्णय के आधार पर पुनः सुनवाई न होने का सिद्धांत यहां लागू नहीं किया जा सकता।
इसी आधार पर हाई कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग का आदेश रद करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को रिकार्ड रिटेंशन पालिसी, रिकार्ड नष्ट करने से संबंधित नियम, परिपत्र, आदेश तथा उस कार्रवाई को मंजूरी देने वाले सक्षम अधिकारी का नाम और पदनाम उपलब्ध कराएं। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी जानकारी पर कानून के तहत वैध अपवाद लागू होता है तो उसे उसी के अनुरूप देखा जाएगा। हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि यह पूरी प्रक्रिया प्रमाणित प्रति प्राप्त होने से 60 दिन के भीतर पूरी की जाए।