जीआरएमसी के सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के पूर्व अधीक्षक डॉ. गुप्ता के खिलाफ फर्जी दस्तावेजों के मामले में दो माह में पूरी होगी विभागीय जांच
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने महाविद्यालय की अपील खारिज करते हुए यह निर्देश दिए। साथ ही डॉ. गुप्ता को 28 अक्टूबर को डीन के समक्ष उपस्थित होने के लिए कहा है।
Publish Date: Tue, 27 Oct 2026 11:54:05 AM (IST)Updated Date: Tue, 27 Oct 2026 11:54:24 AM (IST)
HighLights
- हाईकोर्ट ने खारिज की महाविद्यालय की अपील
- 28 अक्टूबर को डीन के समक्ष उपस्थित होने के निर्देश
- एफआईआर रद्द होने से विभागीय जांच पर असर नहीं
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय (जीआरएमसी) के सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के पूर्व अधीक्षक डॉ. गिरजा शंकर गुप्ता के खिलाफ कथित फर्जी दस्तावेजों से नौकरी हासिल करने के आरोपों की विभागीय जांच दो महीने में पूरी करनी होगी। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने महाविद्यालय की अपील खारिज करते हुए यह निर्देश दिए। साथ ही डा. गुप्ता को 28 अक्टूबर को डीन के समक्ष उपस्थित होने के लिए कहा है।
डॉ. गुप्ता चाहें तो आरोप पत्र का जवाब दे सकते हैं: कोर्ट
न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र यादव की युगलपीठ ने 22 अक्टूबर को यह आदेश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डॉ. गुप्ता चाहें तो आरोप पत्र का जवाब दे सकते हैं। यदि वे जांच में शामिल नहीं होते हैं, तो जांच अधिकारी उनके खिलाफ एकपक्षीय कार्रवाई कर सकेंगे। डॉ. गुप्ता के खिलाफ 30 अक्टूबर 2025 को विभागीय आरोप पत्र जारी किया गया था। जांच अधिकारी केपी रंजन ने 21 नवंबर 2025 को उन्हीं आरोपों पर अलग आरोप पत्र जारी किया था। डीन की आपत्ति के बाद इसे वापस ले लिया गया।
बाद में जांच अधिकारी और पीठासीन अधिकारी ने संयुक्त हस्ताक्षर से जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की। डॉ. गुप्ता की याचिका पर एकलपीठ ने इस प्रक्रिया को अनुचित मानते हुए जांच रिपोर्ट निरस्त कर दी थी औरनए सिरे से जांच के निर्देशदिए थे। इसे खिलाफ डीन ने अपील दायर की।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने जांच अधिकारी और पीठासीन अधिकारी के संयुक्त हस्ताक्षर से आरोप पत्र जारी करने और जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने को उचित ठहराने के लिए कहा, लेकिन महाविद्यालय की ओर से इसका संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा सका। इस आधार पर युगलपीठ ने एकलपीठ के आदेश में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया।
एफआईआर निरस्त होने से विभागीय जांच पर असर नहीं
सुनवाई में डॉ. गुप्ता की ओर से बताया गया कि हाई कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2026 को उनके खिलाफ दर्ज एफआइआर निरस्त कर दी है। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एफआइआर प्रक्रियात्मक खामी के आधार पर निरस्त हुई थी। इसमें अनुभव प्रमाण-पत्रों की प्रामाणिकता या आरोपों की सच्चाई पर निर्णय नहीं दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले में एफआईआर निरस्त होने या बरी होने से विभागीय जांच में स्वत: दोषमुक्ति नहीं मिलती। कोर्ट ने यह भी कहा कि डॉ. गुप्ता को पहले ही उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों के संबंध में अनावश्यक मांग कर जांच में देरी नहीं करनी चाहिए।