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200 करोड़ के बांड जुटाने में ग्वालियर नगर निगम के छूट रहे पसीना, सेबी से मंजूरी मिलना बड़ी चुनौती

अमृत योजना 2.0 के अंतर्गत ग्वालियर में काम करने के लिए केंद्र सरकार ने 917 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं। इसमें 25 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार, 58 प्रतिशत...और पढ़ें

By Priyank SharmaEdited By: Rajdil Shivhare
Publish Date: Sat, 26 Sep 2026 09:59:03 PM (IST)Updated Date: Sat, 26 Sep 2026 09:59:57 PM (IST)
200 करोड़ के बांड जुटाने में ग्वालियर नगर निगम के छूट रहे पसीना, सेबी से मंजूरी मिलना बड़ी चुनौती
ग्वालियर नगर निगम का भवन।

HighLights

  1. अमृत योजना 2.0 के अंशदान के लिए ग्रीन बांड की तैयारी
  2. सालाना आय से ज्यादा खर्च, रुपया वापसी की प्लानिंग पर फंसा पेंच
  3. बांड जारी करने के लिए निगम को बढ़ानी होगी अपनी वसूली

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। नगर निगम की वित्तीय स्थिति सुधारने और अमृत योजना 2.0 के अंतर्गत अपने 350 करोड़ रुपये के अंशदान देने के लिए नगर निगम द्वारा 200 करोड़ रुपये के बांड जुटाने की प्रक्रिया में पसीना छूट रहा है। इसका कारण है कि बांड जारी करने से पहले भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) से अनुमति लेनी होगी, लेकिन निगम की बैलेंस शीट के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि ये रुपया वापस करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। वर्तमान आंकड़ों के लिहाज से सेबी से अनुमति मिलना बहुत मुश्किल साबित होगा।

एमआईसी से ली मंजूरी, परिषद को स्वीकृति के लिए भेजा प्रस्ताव

हालांकि नगर निगम ने ग्रीन बांड जुटाने के लिए मेयर इन काउंसिल (एमआईसी) से मंजूरी ले ली है और परिषद को स्वीकृति के लिए प्रस्ताव भेजा गया है। वहां से अनुमति मिलने के बाद इसे शासन को भी भेजा जाएगा और उसके बाद सेबी में आवेदन करना होगा, लेकिन उससे पहले योजना तैयार करना निगम अधिकारियों के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। इसका कारण है कि सेबी अनुमति देने से पहले निवेशकों के रुपये वापस करने का पूरा प्लान पूछेगा।


इसके अलावा यह भी देखा जाएगा कि सालभर में नगर निगम द्वारा सभी प्रकार के टैक्स और वसूली के रूप में कितनी राशि जुटाई जाती है। ऐसे में ये 200 करोड़ रुपये की राशि कैसे खर्च की जाएगी और बांड लेने वालों को किस प्रकार से निगम द्वारा रुपया वापस किया जाएगा, इसकी पूरी प्लानिंग निगम के वित्त विभाग को करनी होगी।

बता दें कि अमृत योजना 2.0 के अंतर्गत ग्वालियर में काम करने के लिए केंद्र सरकार ने 917 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं। इसमें 25 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार, 58 प्रतिशत राशि राज्य सरकार और शेष 17 प्रतिशत राशि नगर निगम को जुटानी होगी। इसके अलावा यदि टेंडर में राशि एबव (तय से अधिक) में जाती है, तो उसे भी निगम को वहन करना होगा। ऐसे में प्राथमिक तौर पर नगर निगम को लगभग 350 करोड़ रुपये जुटाने होंगे, जिनमें से 200 करोड़ रुपये बांड के जरिए जुटाने की प्रक्रिया की गई है।

जितनी राशि के बांड, उतनी सालाना वसूली भी नहीं

नगर निगम द्वारा 200 करोड़ रुपये के बांड जारी करने के लिए प्रक्रिया तो की जा रही है, लेकिन सालाना आय के नाम पर 185 करोड़ रुपये ही इकट्ठे हो पाते हैं। इसके अलावा शासन स्तर से अनुदान मिलाकर सालभर में कुल 350 करोड़ रुपये मिल पाते हैं। अब दूसरा पहलू यह है कि निगम का स्थापना व्यय ही सालभर में मिलने वाली राशि के बराबर है। ऐसे में यह पहलू सामने आ रहा है कि आय के बराबर खर्चा होने की स्थिति में बाजार से जुटाए गए रुपये को वापस करने की संभावना ही नहीं रहेगी। इसलिए जरूरी है कि निगम की आय बढ़ाने पर जोर दिया जाए।

ऐसे चलती है बांड की प्रक्रिया

नगर निगम द्वारा विकास और बुनियादी परियोजनाओं के लिए जनता या निवेशकों से ऋण के रूप में बांड जारी कर रुपया जुटाया जाता है। ये बांड नेशनल स्टाक एक्सचेंज या बांबे स्टाक एक्सचेंज के जरिए बेचे जाते हैं। बदले में नगर निगम को निवेशकों को ब्याज का भुगतान करना होता है, साथ ही तय समय सीमा के बाद निश्चित रकम वापस करनी होती है। ऐसे में आय बढ़ाए बिना बांड की राशि वापस करना निगम के लिए संभव नहीं हो सकेगा।

नगर निगम बांड जारी करने के लिए हम प्रक्रिया कर रहे हैं। एमआइसी से मंजूरी मिलने के बाद इसे परिषद को भेजा जा रहा है। इसके बाद इसे शासन को अंतिम स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा। जहां तक वित्तीय स्थिति की बात है, तो हम उसके लिए प्रयास कर रहे हैं। -अरविंद शर्मा, अपर आयुक्त, वित्त नगर निगम।