नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। जिस कानून को ग्वालियर-चंबल सहित डकैत प्रभावित इलाकों में अपहरण, डकैती और सामूहिक हत्याओं पर अंकुश लगाने के लिए 1981 में लागू किया गया था, उसकी मौजूदा जरूरत पर अब हाईकोर्ट ने ही सवाल खड़ा कर दिया है। पूर्व गृह मंत्री डॉ. गोविंद सिंह की जनहित याचिका पर हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने पूछा है कि जब प्रदेश में अब कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है, तो मध्य प्रदेश डकैती एवं व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम, 1981 को खत्म क्यों न कर दिया जाए।
वर्ष 2020 से 2026 के मध्य 1000 से ज्यादा हुईं FIR
याचिका में दावा किया गया है कि वर्ष 2020 से 2026 के बीच ग्वालियर-चंबल के छह जिलों ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया, भिंड, मुरैना और श्योपुर में इस विशेष कानून के तहत एक हजार से ज्यादा एफआइआर दर्ज की गई हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि सामान्य विवाद, जमीन-जायदाद के झगड़े और मारपीट जैसे मामलों में भी कई बार अधिनियम की धारा 11 और 13 जोड़ दी जाती हैं।
विधानसभा में सरकार के दावे और FIR के आंकड़ों में विरोधाभास
याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2020 से 2026 के दौरान तीन बार विधानसभा में तत्कालीन गृह मंत्री यह जानकारी दे चुके हैं कि प्रदेश में कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है। इसके बावजूद इसी अवधि में ग्वालियर-चंबल के छह जिलों में इस कानून के तहत एक हजार से अधिक एफआइआर दर्ज होने का दावा किया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव शर्मा ने हाईकोर्ट को बताया कि जिस परिस्थिति में यह कानून बनाया गया था, वह अब समाप्त हो चुकी है।
इसके बावजूद विशेष कानून का इस्तेमाल जारी है। याचिका में इसे नागरिकों के समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों के विपरीत बताते हुए कानून को असंवैधानिक घोषित कर निरस्त करने की मांग की गई है।
धारा 11 और 13 पर सबसे ज्यादा सवाल
याचिका में विशेष रूप से अधिनियम की धारा 11 और 13 के इस्तेमाल पर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि आपसी रंजिश, जमीन विवाद या मामूली मारपीट जैसे मामलों में भी पुलिस इन धाराओं को जोड़ देती है। इससे आरोपितों के लिए सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में कानूनी राहत हासिल करना कठिन हो जाता है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि कठोर प्रावधानों के कारण निर्दोष ग्रामीणों, किसानों और युवाओं को भी परेशानी उठानी पड़ सकती है।
ऐसे में यह देखना जरूरी है कि पिछले छह वर्षों में इस कानून के तहत दर्ज मामलों में वास्तव में कितने प्रकरण डकैती, अपहरण या संगठित अपराध से जुड़े थे।
1981 में डकैतों के आतंक से निपटने बनाया था कानून
- मध्य प्रदेश डकैती एवं व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम वर्ष 1981 में उस समय लागू किया गया था, जब ग्वालियर-चंबल के बीहड़ों के साथ सतना और पन्ना के जंगलों में डकैत गिरोह सक्रिय थे।
- डकैत गिरोह डकैती, अपहरण और सामूहिक हत्याओं जैसी गंभीर वारदातों को अंजाम देते थे। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए विशेष कानून बनाया गया, जिसमें कड़े दंड और विशेष न्यायालय में सुनवाई का प्रावधान रखा गया।
- छह अक्टूबर 1981 को तत्कालीन राष्ट्रपति की अनुमति मिलने के बाद सात अक्टूबर को गजट अधिसूचना जारी कर कानून लागू किया गया था। करीब 45 साल बाद अब इसकी प्रासंगिकता पर न्यायिक स्तर पर सवाल उठने से कानून फिर चर्चा में है।
सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा
पूर्व गृह मंत्री डॉ. गोविंद सिंह की याचिका पर हाईकोर्ट ने गृह विभाग के प्रमुख सचिव, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) तथा ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया, भिंड, मुरैना और श्योपुर के पुलिस अधीक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। सभी से चार सप्ताह में जवाब मांगा गया है।
सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता धर्मेंद्र शर्मा ने कोर्ट को बताया कि डकैतों की रोकथाम के लिए यह विशेष कानून कड़े प्रावधानों के साथ बनाया गया था और इसके तहत मामलों की सुनवाई विशेष न्यायालय में होती है। उन्होंने यह भी बताया कि कई वर्षों से जंगल या बीहड़ में कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है।