
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : सोशल मीडिया पर इन दिनों 80 के दशक के अंदाज में तस्वीरें बनाने का ट्रेंड तेजी से चल रहा है। लोग अपनी सामान्य फोटो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल में डालकर उसमें पुराने जमाने के कपड़े, हेयरस्टाइल, रंग और कैमरा इफेक्ट जोड़ रहे हैं। कुछ सेकंड में तैयार होने वाली इन तस्वीरों को इंटरनेट मीडिया पर साझा किया किया जा रहा है। हालांकि, साइबर सुरक्षा की दृष्टि से यह ट्रेंड भारी भी पड़ सकता है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी एआई टूल में फोटो डालने का मतलब केवल फोटो का रूप बदलना नहीं होता। फोटो एक डिजिटल जानकारी है और उसे किसी ओपन सर्वर पर भेजा जाता है। इसलिए फोटो अपलोड करने से पहले यह समझना जरूरी है कि वह ओपन सोर्स फोटो के साथ क्या करती है, उसे कितने समय तक रखती है और क्या उसका उपयोग दूसरे कार्यों को बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है।
साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट शुभम सोलंकी के अनुसार, अच्छी क्वालिटी की एक फोटो में केवल चेहरा ही नहीं होता। तस्वीर का बैकग्राउंड भी कई जानकारियां दे सकता है। घर के बाहर की फोटो है तो मकान नंबर या आसपास की जगह का पता चल सकता है। ऑफिस की फोटो में कंपनी का नाम, आईडी कार्ड या स्क्रीन पर दिखाई देने वाली जानकारी नजर आ सकती है। गाड़ी की फोटो में नंबर प्लेट दिखाई दे सकती है। अलग-अलग जगह से मिली छोटी-छोटी जानकारियां जब एक साथ जुड़ती हैं तो किसी व्यक्ति की पहचान के बारे में काफी कुछ पता लगाया जा सकता है।
साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट दर्शना जैन के अनुसार, किसी भी एआई टूल का उपयोग करने से पहले उसकी प्राइवेसी पालिसी देखना सबसे जरूरी होता है। आम यूजर को खास तौर पर तीन बातें देखनी चाहिए। पहला अपलोड की गई फोटो डाटा में कितने समय तक स्टोर होता है।
दूसरा क्या कंपनी फोटो का उपयोग एआई को बेहतर बनाने के लिए करती है और तीसरा फोटो हटाने का विकल्प मिलता है या नहीं। हर एआई टूल की पॉलिसी अलग हो सकती है। ऐसे में सिर्फ यह देखकर किसी टूल पर भरोसा नहीं करना चाहिए कि वह सोशल मीडिया पर वायरल है या दूसरे लोग उसका उपयोग कर रहे हैं। इसके साथ ही यदि टूल जरूरत से ज्यादा परमिशन मांगे तो उससे सावधान रहना बेहतर है।
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