
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की जांच रिपोर्ट पर गुरुवार को हाई कोर्ट में अंतिम बहस होना थी, लेकिन कोर्ट का समय समाप्त होने से टल गई। अब कोर्ट 17 नवंबर को अंतिम बहस सुनेगी। गौरतलब है कि दिसंबर-जनवरी में भागीरथपुरा में दूषित पानी की वजह से हुई 36 मौत हुई थी। मामले को लेकर हाई कोर्ट में सात जनहित याचिकाएं चल रही हैं।
इन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मामले की जांच के लिए एक सदस्यीय जांच आयोग गठित किया था। लगभग तीन माह पहले आयोग अपनी सील बंद रिपोर्ट कोर्ट को दे चुका है। कोर्ट के आदेश के बाद 600 से ज्यादा पेज की इस रिपोर्ट को हाई कोर्ट की साइट पर अपलोड कर दिया गया है। यह सामने आया है आयोग की रिपोर्ट में जांच आयोग की रिपोर्ट के अंतिम 112 पेजों में रिपोर्ट का सार है।
कहा है कि अधिकारियों को वर्ष 2018 में ही पता चल गया था कि शहर के एक बड़े हिस्से में दूषित पानी सप्लाइ हो रहा है, बावजूद इसके उन्होंने लापरवाही की। कोई प्रभावी सुधार नहीं किया। भागीरथपुरा के रहवासी सितंबर 2025 से लगातार गंदे पानी की शिकायत कर रहे थे, लेकिन उनकी शिकायत पर ध्यान नहीं दिया गया। समय पर ध्यान दे दिया जाता तो इतना बड़ा हादसा नहीं होता।
रिपोर्ट में नई पेयजल लाइन के टेंडर की प्रक्रिया में 20 माह की देरी का भी उल्लेख किया गया है। यह बात भी जांच में सामने आई कि टेंडर स्वीकृति की फाइलें जानबूझकर लंबित रखी गईं। आयोग ने पेयजल और ड्रेनेज लाइन बिछाने में हुई गड़बडियों की ओर भी इशारा किया है और माना कि दोनों लाइनों के एक साथ बिछाने से पेयजल दूषित होने की स्थिति बनी। आयोग ने नगर निगम से पेयजल और ड्रेनेज व्यवस्था का काम लेकर अलग जल-मल बोर्ड गठित करने की सिफारिश भी की है।
आयोग ने भागीरथपुरा में 22 लोगों के दूषित पानी की वजह से मरने की पुष्टि की है। जबकि शेष मौत को लेकर लिखा है कि कारण स्पष्ट नहीं। आयोग ने दूषित पानी की वजह से मारे गए लोगों के स्वजन को 10 लाख रुपये क्षतिपूर्ति दिए जाने की सिफारिश की है। मामले में अंतिम बहस के बाद ही तय होगा कि कोर्ट हादसे के लिए किसे जिम्मेदार ठहराती है और क्या कार्रवाई की जाती है।