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अनुकंपा नियुक्ति अधिकार नहीं आपात राहत है, हाई कोर्ट ने कहा- यह रोजगार पाने का वैकल्पिक माध्यम नहीं

कोर्ट ने पक्षकारों को सुनने के बाद याचिका निरस्त कर दी। कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति कोई निहित अधिकार नहीं है। इसका उद्देश्य केवल उस परिवार को तत्...और पढ़ें

By Kuldeep BhawsarEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Wed, 24 Jun 2026 08:08:02 PM (IST)Updated Date: Wed, 24 Jun 2026 08:12:26 PM (IST)
अनुकंपा नियुक्ति अधिकार नहीं आपात राहत है, हाई कोर्ट ने कहा- यह रोजगार पाने का वैकल्पिक माध्यम नहीं
इंदौर हाई कोर्ट।

HighLights

  1. याचिकाकर्ता के पिता स्वयं अनुकंपा नियुक्ति पर नियुक्त हुए थे।
  2. उन्हें अनुकंपा नियुक्ति उनकी माता की मृत्यु के बाद मिली थी।
  3. कोर्ट ने पक्षकारों को सुनने के बाद याचिका निरस्त कर दी।

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। मप्र हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। निगम में अनुकंपा नियुक्ति की मांग करते हुए चल रही एक याचिका का निराकरण करते हुए कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति कोई “वंशानुगत रोजगार” या “अधिकार” नहीं है।

बल्कि मृत कर्मचारी के स्वजन को अचानक सामने आए आर्थिक संकट से उबारने के लिए दी जाने वाली एक सीमित एवं अपवादात्मक राहत है। यह अधिकार नहीं है। अगर परिवार वर्षों तक स्वयं का भरण-पोषण करता रहा है तो इसके बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग न्यायसंगत नहीं मानी जा सकती।


याचिकाकर्ता अरविंद चावरे के पिता कमल किशोर चावरे का 30 अप्रैल 2015 को निधन हो गया था। याचिकाकर्ता ने 22 जून 2015 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था, जिसे 14 जून 2021 को निगम ने अस्वीकार कर दिया।

निगम ने आवेदन निरस्त करते का कारण बताते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज है और उसके पास कोई पुलिस क्लियरेंस अथवा चरित्र प्रमाण पत्र भी नहीं है। इस निरस्ती के दो वर्ष तक याचिकाकर्ता ने कोई कार्रवाई नहीं की। वर्ष 2023 में उसने इस संबंध में हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

नगर निगम की ओर से एडवोकेट अमेय बजाज ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क रखा कि निगमकर्मी की मृत्यु के आठ वर्ष बाद चाही गई अनुकंपा नियुक्ति का कोई औचित्य नहीं है।

अगर परिवार वास्तव में आर्थिक संकट में होता तो वह तत्काल राहत चाहता। याचिकाकर्ता ने पिता की मृत्यु के लगभग आठ वर्ष बाद रोजगार की मांग की है इसका मतलब है कि तात्कालीन आर्थिक संकट समाप्त हो चुका है।

जिस वक्त याचिकाकर्ता ने निगम में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन दिया था, उस वक्त उसके विरुद्ध दो आपराधिक प्रकरण दर्ज थे। याचिकाकर्ता के पिता स्वयं अनुकंपा नियुक्ति पर निगम में नियुक्त हुए थे। उन्हें यह अनुकंपा नियुक्ति उनकी माता की मृत्यु के बाद मिली थी।

कोर्ट ने पक्षकारों को सुनने के बाद याचिका निरस्त कर दी। कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति कोई निहित अधिकार नहीं है।

इसका उद्देश्य केवल उस परिवार को तत्काल राहत देना है जो कमाने वाले सदस्य की अचानक मृत्यु से आर्थिक संकट में आ गया हो। यदि परिवार लंबे समय तक स्वयं का निर्वाह कर चुका है तो अनुकंपा नियुक्ति का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।