प्रफुल्ल चौरसिया, आशु, इंदौर, नईदुनिया,Corona Indore News ।

कोरोना महामारी से निपटने में कारगर साबित हुई रेमडेसिविर संक्रमित मरीजों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है, लेकिन फिलहाल देश-प्रदेश में इसकी कमी चिंता का विषय बन गई है। दवा का टोटा ही नहीं, इसके दाम भी मरीजों की जान निकालने के लिए काफी हैं। देश में एक कंपनी का रेमडेसिविर का इंजेक्शन 800-900 रुपये में मिल रहा है तो बाकी कंपनियां यही इंजेक्शन चार हजार से लेकर 5400 रुपये तक बेच रही हैं। यानी कीमतों में छह-सात गुना का अंतर है। दवा बाजार में बड़ी संख्‍या में लोग इंजेक्‍शन और दवाओं के लि‍ए पहुंच रहे हैं।

कोरोना संक्रमित मरीजों को लगाए जाने वाले रेमडेसिविर इंजेक्शन की कमी को लेकर शहर में हाहाकार मचा हुआ है। इंजेक्शन की जमकर कालाबाजारी हो रही है। हालत यह है कि बुधवार सुबह से ही शहर के कई मेडिकल स्टोर्स के बाहर इंजेक्शन खरीदने वालों की भीड़ लग गई। इसे नियंत्रित करने के लिए कतारें लगवाना पड़ी। कई दुकानदारों ने तो दुकानों के बाहर रेमडेसिविर इंजेक्शन उपलब्ध नहीं है के बोर्ड भी लगवा दिए। एक दिन पहले ही कलेक्टर ने इस इंजेक्शन की कालाबाजारी रोकने के लिए दिशा निर्देश जारी किए थे लेकिन इसका भी कोई असर नजर नहीं आया। बुधवार दोपहर दवा बाजार में हालात यह थी कि जिन मेडिकल दुकानों पर रेमडेसिविर इंजेक्शन उपलब्ध था उनके बाहर सैंकडों की संख्या में खरीदारों की भीड़ मौजूद थी।

देश में कुछ चुनिंदा कंपनियां ही रेमडेसिविर इंजेक्शन बनाती हैं। संकट का एक कारण यह माना जा रहा है कि फरवरी आते-आते देश में जब कोरोना का संक्रमण बहुत कम हो गया तो कंपनियों ने रेमडेसिविर बनाना भी बंद कर दिया। इससे पहले कंपनियों ने जो इंजेक्शन बनाकर रखे थे, वे सब एक्सपायरी हो चुके थे। कंपनियों को बड़ी मात्रा में यह इंजेक्शन नष्ट करना पड़े थे, जिससे उन्हें नुकसान भी हुआ।

15 मार्च के आसपास जैसे ही कोरोना का संक्रमण एक बार फिर बढ़ा तो मुश्किल खड़ी हो गई। जानकारों का कहना है कि रेमडेसिविर को बनाने के बाद 18 दिन के इंक्यूबेशन (गुणवत्ता ट्रायल) में रखना होता है। इसके बाद ही इसे उपयोग में लाया जा सकता है। महामारी की दूसरी लहर आने के बाद कंपनियों ने फिर रेमेडसिविर बनाना शुरू किया, लेकिन तब तक पुराना स्टाक समाप्ति की कगार पर आ पहुंचा है। अब नए निर्माण का इंक्यूबेशन पीरियड 8-10 अप्रैल तक पूरा होने जा रहा है। इसके बाद ही बाजार और अस्पतालों में रेमडेसिविर की आपूर्ति पटरी पर आ सकेगी।

आठ हजार इंदौर की ही खपत

इंदौर में ही सभी दवा कंपनियों के स्टाकिस्ट और सीएंडएफ हैं। राज्य के अधिकांश जिलों में इंदौर से ही दवा की आपूर्ति होती है। प्रदेश में कोविड वायरस का सर्वाधिक 24 प्रतिशत भार इंदौर पर है। यहां हर दिन औसत 700 नए मरीज सामने आ रहे हैं। इंदौर में कोरोना की पॉजिटिव दर 15 प्रतिशत है। ऐसे में स्वाभाविक है कि यहां रेमडेसिविर की जरूरत भी ज्यादा है। इस समय अकेले इंदौर में ही रोज 8 हजार इंजेक्शन की खपत है।

यह कंपनियां बनाती हैं रेमडेसिविर

विश्व में कोरोना महामारी आने के बाद सबसे पहले विदेश की एक कंपनी ने रेमडेसिविर बनाया था। विदेश की कंपनी ने ही बाद में भारत में कुछ कंपनियों से अनुबंध करके इस इंजेक्शन का फॉर्मूला दिया था। इसके बाद भारत में भी रेमडेसिविर का निर्माण होने लगा। फिलहाल जायडस-केडिला, हेट्रो, सिप्ला, जुबिलिएंट, मायलान और डॉ. रेड्डीज जैसी कंपनियां रेमडेसिविर बना रही हैं। इनमें जायडस-केडिला का रेमडेसिविर सबसे सस्ता 900 रुपये के आसपास मिल रहा है। बाकी कंपनियों के रेमडेसिविर आम और गरीब मरीजों की पहुंच से काफी दूर हैं।

परेशान लोगों ने कही अपनी बात

-गोमा की फेल (मालवा मिल) के रहने वाले सनी ने कहा कि मैं दो दिन से इंजेक्शन के लिए भटक रहा हूं। आज जाकर इंजेक्शन मिला है। वह भी जुगाड़ लगाने से। 899 रुपये की कीमत का एक इंजेक्शन सात हजार रुपये में मिला है। अब स्वजन को बचाना है तो ऐसे ही इंजेक्शन की जुगाड़ करनी पड़ेगी।

-बेटमा के ओमप्रकाश कुशवाह ने बताया कि मेरी माताजी क्लाथ मार्केट अस्पताल में भर्ती है। जिन्हें रेमडेसिविर इंजेक्शन लगना है लेकिन मैं शहर में भटक रहा हूं। मुझे इंजेक्शन नहीं मिल रहा है।

दुकानदारों ने लगाए स्टाक नहीं होने की सूचना

इंजेक्शन खरीदी को लेकर कई लोग भटक रहे हैं। कई बार इंजेक्शन की जानकारी लेने के लिए उपभोक्ता और दुकानदारों के बीच विवाद की स्थिति भी बन रही है। इसे देखते हुए दुकानदारों ने अपनी दुकानों के बाहर रेमडेसिविर इंजेक्शन नहीं होने की सूचना चस्पा कर दी है। एक दुकानदार ने कहा कि मेरे पास स्टाक होगा, तभी मैं आपको इंजेक्शन दे पाऊंगा।

Posted By: gajendra.nagar

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