
लोकेश सोलंकी, इंदौर। मप्र लोकसेवा आयोग (पीएससी) के जरिये सीधी भर्ती से प्रोफेसर बनने वाले तीन अभ्यर्थियों का प्रोबेशन 18 सितंबर को खत्म किए जाने के बाद विवाद खड़ा हो गया है। एक प्रोफेसर को तीन संतान के बावजूद नियुक्ति और नियमितीकरण का लाभ दिया गया है। ये प्रोफेसर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पदाधिकारी रह चुके हैं। सूची में शामिल अन्य प्रोफेसर को नियम तोड़कर नियमित किए जाने का आरोप लग रहा है।
पीएससी ने 2009 में प्रदेश के सरकारी कॉलेजों के 385 पदों पर नियुक्ति का विज्ञापन जारी किया था। सिर्फ इंटरव्यू के जरिये चयन कर लिया गया। इसके लिए पीएचडी के बाद सरकारी या अनुदान प्राप्त कॉलेज में दस वर्ष तक पीजी कक्षाओं में शिक्षण का अनुभव मांगा गया था। प्रक्रिया के जरिये 2011 में 242 पदों पर नियुक्ति दी गई। चयन सूची जारी होने के बाद जमकर हंगामा मचा। सूची में ऐसे कई अभ्यर्थियों के नाम हैं, जो आवेदन तक न तो दस साल का अनुभव जुटा सके थे, न पीएचडी को दस वर्ष हुए थे। विवादों में उलझी नियुक्तियों पर जांच के दावे हुए। इसके चलते न तो सात वर्ष बाद तक कई प्रोफेसरों का प्रोबेशन खत्म किया गया और न उन्हें नियमित किया गया।
बीते महीने ऐसे 15 प्रोफेसरों के रिकॉर्ड सत्यापन की कार्रवाई शुरू हुई। इसी सप्ताह दो आदेश जारी कर सात प्रोफेसरों का प्रोबेशन खत्म कर नियमितीकरण का लाभ दिया गया। इनमें इंदौर के रहने वाले और वर्तमान में उज्जैन के शासकीय माधव कॉलेज में पदस्थ डॉ. दिनेश दवे (वाणिज्य) के साथ इंदौर के जीएसीसी में पदस्थ डॉ. प्रेरणा ठाकुर (इतिहास) का नाम भी शामिल है। डॉ. दवे की तीन संतान हैं, जबकि शासकीय सेवा के नियमों के मुताबिक तीन संतान होने पर 2001 के बाद किसी भी व्यक्ति को नियुक्ति नहीं दी जा सकती। डॉ. दवे मान भी रहे हैं कि उनकी तीन संतान हैं।
डॉ. ठाकुर के पास नियुक्ति दिनांक तक 10 वर्ष तक पढ़ाने का अनुभव नहीं होने की शिकायत की जा रही है। वे सुगनीदेवी कॉलेज में अनुबंध या अतिथि शिक्षक के रूप में पढ़ाती रही हैं, जबकि चयन शर्तों के मुताबिक निजी अनुदान प्राप्त कॉलेज में नियमित नियुक्ति होने पर ही अनुभव मान्य किया जाता है। ऐसी नियुक्ति या तो कोड-28 के अधीन यूनिवर्सिटी द्वारा हो सकती है या फिर शासन द्वारा अनुदानित पदों पर मानी जाती है। सत्यापन के लिए कॉलेज से नियुक्ति विज्ञापन, लेटर से लेकर वेतनपत्रक, उपस्थिति रजिस्टर, सर्विस बुक तक तलब किए गए थे।
सूत्रों के मुताबिक मामले में सुगनीदेवी कॉलेज ने आधे-अधूरे रिकॉर्ड ही भोपाल पहुंचाए। फिर भी नियमितीकरण कर दिया गया। प्राचार्य डॉ. मीना मतकर का कहना है कि मांगे गए दस्तावेज उच्च शिक्षा विभाग को सौंप दिए गए थे। सर्विस बुक नहीं थी, इसलिए नहीं दी गई। इस मामले में उच्च शिक्षा विभाग के अतिरिक्त संचालक प्रो. केएन चतुवेर्दी ने कोई भी टिप्पणी करने इनकार कर दिया।
हो चुकी कई शिकायतें
नियुक्तियों में गड़बड़ी पर कई शिकायतें हो चुकी हैं। प्रभावित प्रोफेसरों के साथ व्हीसल ब्लोअर पंकज प्रजापति ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट ने उच्च शिक्षा विभाग को शिकायत पर जांच के आदेश दिए थे। प्रजापति के मुताबिक समय निकालकर शासन ने मामला ठंडा कर दिया। जांच कमेटी ने फर्जी प्रमाण पत्र लगाने की बात भी मानी थी लेकिन विभाग आरटीआई में भी जांच रिपोर्ट नहीं दे रहा है।
बाद में हुई संतान
नियुक्ति के समय तो एक ही संतान थी। बाद में दो संतान हुई। इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं बता सकता। जो शिकायत कर रहे हैं, उनके पास जन्म तारीख भी होगी। -डॉ. दिनेश दवे, प्रोफसर, शासकीय माधव कॉलेज
14 साल पढ़ाया
मेरे पास 14 साल नियमित पढ़ाने का अनुभव है। कोड-28 में नियुक्त नहीं थी, लेकिन नियमित थी क्योंकि कॉलेज का ट्रस्ट पीएफ कटौती भी करता था। उसकी रसीदें भी सौंपी हैं। मेरा पद अनुदान वाला नहीं था, लेकिन कॉलेज तो अनुदान प्राप्त था। विधायक की बहन हूं, इसलिए निशाना बना रहे हैं। -डॉ. प्रेरणा ठाकुर, प्रोफेसर जीएससी