
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : पहाड़ों में भूस्खलन कब हो सकता है, इसकी पहले से जानकारी मिले और समय रहते लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाया जा सके, इस दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) इंदौर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग की इंस्टिट्यूट चेयर प्रोफेसर नीलिमा सत्यम पिछले 25 वर्षों से काम कर रही हैं। इन कार्यों के लिए उन्हें अमेरिकन जियोफिजिकल यूनियन के प्रतिष्ठित यूनियन मेडल से सम्मानित किया जाएगा।
नीलिमा ने दार्जिलिंग में हिमालय के कालिम्पोंग से लेकर उत्तराखंड और केरल के वायनाड व इडुक्की तक भूस्खलन के खतरे को समझने और उसकी निगरानी के लिए शोध किया है। उत्तराखंड के लामबगड़ में उन्होंने ढलान पर सेंसर लगाकर करीब साढ़े तीन साल तक निगरानी की और स्थानीय स्तर पर चेतावनी प्रणाली विकसित की। उनका शोध अब नीति और मानक तैयार करने तक पहुंच चुका है।
प्रोफेसर नीलिमा सत्यम का शोध प्राकृतिक आपदाओं से जुड़े जियो-हैजर्ड पर केंद्रित है। पिछले कुछ वर्षों में उनका प्रमुख फोकस भूस्खलन रहा है। उनका सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भूस्खलन कहां हुआ, बल्कि यह समझना है कि किस जगह भूस्खलन क्यों होता है, उसकी प्रक्रिया क्या है और उससे पहले खतरे के कौन से संकेत मिल सकते हैं।
इसी सोच के साथ उन्होंने भूस्खलन की निगरानी और चेतावनी प्रणाली पर काम किया। उनका शोध फील्ड में वास्तविक परिस्थितियों को समझने से लेकर सेंसर आधारित मानिटरिंग और स्थानीय स्तर पर चेतावनी व्यवस्था विकसित करने तक फैला हुआ है।
प्रोफेसर नीलिमा बताती हैं कि भूस्खलन की चेतावनी प्रणाली विकसित करने का काम वर्ष 2016 से शुरू किया था। दार्जिलिंग में हिमालय के कालिम्पोंग में स्थानीय स्तर पर भूस्खलन चेतावनी प्रणाली विकसित करने का काम किया। इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था तैयार करना था, जिससे किसी क्षेत्र में भूस्खलन का खतरा बढ़ने पर समय रहते इसकी जानकारी मिल सके।
उत्तराखंड के लामबगड़ गांव में नीलिमा की टीम ने ढलान पर सेंसर लगाए। इसके बाद करीब तीन से साढ़े तीन साल तक लगातार मानिटरिंग की। इस दौरान यह समझने का प्रयास किया गया कि ढलान में किस तरह के बदलाव होते हैं और उन्हें मापने वाले उपकरण किस तरह खतरे की पहचान में मदद कर सकते हैं। इसी शोध के आधार पर स्थानीय स्तर पर चेतावनी प्रणाली विकसित करने का काम किया।
केरल के वायनाड और इडुक्की में भी प्रोफेसर नीलिमा के मार्गदर्शन में भूस्खलन से जुड़े अध्ययन हुए हैं। वे बताती हैं कि भूस्खलन के खतरे का नक्शा हमेशा एक जैसा नहीं रहता। वर्षा होने पर परिस्थितियां बदलती हैं और उसके साथ खतरे का स्तर भी बदल सकता है।
इसलिए उनकी टीम ने ऐसे हैजर्ड मैप तैयार करने पर काम किया, जो परिस्थितियों में बदलाव के साथ खतरे को समझने में मदद कर सकें। यानी किसी पहाड़ी क्षेत्र को देखकर केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि यहां भूस्खलन का खतरा है। यह भी समझना जरूरी है कि कब खतरा बढ़ सकता है और किन परिस्थितियों में ढलान अस्थिर हो सकता है।
नीलिमा के शोध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भूस्खलन के अलग-अलग प्रकारों को समझना भी है। सामान्य तौर पर भूस्खलन शब्द का इस्तेमाल व्यापक अर्थ में किया जाता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से इसके कई प्रकार होते हैं। मलबे से होने वाली घटनाएं, राक फाल और दूसरे प्रकार के ढलान विफलता की प्रक्रियाएं अलग हो सकती हैं। इसलिए इनके पीछे की भौतिक प्रक्रिया को समझना जरूरी है।
नीलिमा का शोध इसी सवाल पर भी केंद्रित है कि किस तरह की भू-स्थिति में किस प्रकार की घटना हो सकती है और उसकी निगरानी किस तरह की जाए।
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