
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। एबी रोड पर बनने वाले 6.5 किमी लंबे एलिवेटेड कॉरिडोर के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। एलआईजी चौराहे से नवलखा चौराहे तक प्रस्तावित इस कॉरिडोर के निर्माण के विरुद्ध लगी जनहित याचिका हाई कोर्ट ने खारिज कर दी।
हाई कोर्ट की युगलपीठ ने जनहित याचिका तो खारिज की लेकिन सुगम यातायात और निर्माण की डिजाइन से जुड़ी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए निर्माण की निगरानी के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी गठित करने का आदेश भी दिया। शासन के इंजीनियर के साथ याचिकाकर्ता अतुल शेठ और इंटरविनर इंदौर उत्थान समिति के प्रतिनिधियों को इस निगरानी समिति में सदस्य नियुक्त किया है।
एलिवेटेड कॉरिडोर के प्रस्ताव के विरुद्ध जनहित याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ता चार्टर्ड इंजीनियर अतुल शेठ ने मांग की थी कि लंबा एलिवेटेड कॉरिडोर न बनाकर अलग-अलग फ्लाईओवर बनाए जाएं। याचिका के पक्ष में तर्क दिया था कि एबी रोड से गुजरने वाले ज्यादातर वाहन एलआईजी से नवलखा तक की लंबी दूरी तय नहीं करते बल्कि बीच में आने वाले चौराहों से मुड़ जाते हैं।
याचिका के द्वारा मांग रखी गई थी कि इस मार्ग पर आने वाले एमआर-9, एलआईजी, इंडस्ट्री हाउस, गिटार चौराहा, पलासिया, गीता भवन, शिवाजी वाटिका, जीपीओ और नवलखा सहित 9 प्रमुख चौराहों पर वाहनों के चढ़ने-उतरने की सुविधा दी जाए। इसके लिए अलग-अलग ग्रेड सेपरेटर बनाए जाएं।
शेठ ने हाई कोर्ट में इंजीनियरिंग कॉलेज एक्रोपोलिस इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट और आईडीए की 5 अप्रैल 2025 की रिपोर्ट का हवाला देकर कहा था कि अलग-अलग फ्लाईओवर से इस मार्ग पर ट्रैफिक दक्षता 42 प्रतिशत बढ़ सकती है, जबकि एलिवेटेड कॉरिडोर से ट्रैफिक प्रवाह में 10 प्रतिशत से भी कम लाभ होगा।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने इस तर्क का विरोध करते हुए कहा कि एबी रोड पर अब सड़क चौड़ी करने की गुंजाइश जमीन पर बची नहीं है। भविष्य में जनसंख्या और वाहनों की बढ़ोतरी को देखते हुए मौजूदा 6 लेन के ऊपर अतिरिक्त चार लेन देना जरूरी है, जो एलिवेटेड कॉरिडोर से संभव है। यह प्रोजेक्ट भारतीय रोड कांग्रेस के मानकों के अनुसार तैयार किया जा रहा है।
याचिका में इंटरविनर बनी इंदौर उत्थान अभियान समिति ने भी प्रोजेक्ट का समर्थन करते हुए कहा कि कम दूरी पर कई फ्लाईओवर बनाने से बार-बार चढ़ना-उतरना पड़ेगा, मर्जिंग पॉइंट पर बॉटलनेक निर्मित होंगे और ट्रैफिक में बाधा उत्पन्न होगी तथा सुरक्षा व ईंधन खर्च को लेकर चिंताएं भी बढ़ेंगी। बनेगा और फ्यूल व सुरक्षा पर भी असर पड़ेगा।
दोनों पक्ष सुनने के बाद कोर्ट ने सात अक्टूबर को आदेश सुरक्षित रखा था। 26 अक्टूबर को निर्णय सुना दिया गया। हाई कोर्ट ने जनहित याचिका खारिज करते हुए कहा कि एलिवेटेड कॉरिडोर की लागत और डिजाइन सरकार का नीतिगत निर्णय है। इस संबंध में पूर्व में बाल्को, नर्मदा बचाओ और टाटा सेल्युलर जैसे निर्णयों का उल्लेख किया। कोर्ट ने इन निर्णयों के हवाले से कहा कि जब तक दुर्भावना, अवैधता या मनमानी साबित न हो, कोर्ट नीतिगत फैसले में दखल नहीं देगा। तकनीकी निर्धारण कोर्ट नहीं कर सकता वह तकनीकी विशेषज्ञ करेंगे।
कोर्ट ने पीडब्ल्यूडी के चीफ इंजीनियर की अध्यक्षता में कमेटी बनाई। इसमें पीडब्ल्यूडी के दो इंजीनियर, आईडीए के दो इंजीनियर, एसजीएसआईटीएस इंदौर के दो प्रोफेसरों के साथ याचिकाकर्ता अतुल शेठ और उत्थान समिति के दो सदस्य होंगे। कमेटी के सदस्य वे ही बनेंगे जिनके पास इंजीनियरिंग की डिग्री और ब्रिज निर्माण का अनुभव भी हो।
याचिकाकर्ता ने कहा था कि 2019 में एलिवेटेड कॉरिडोर की लागत 350 करोड़ बताई गई थी जो अब 700-750 करोड़ तक पहुंच सकती है। कोर्ट ने अंतिम आंकड़ा तय नहीं किया, लेकिन अधिकारियों को कुल लागत और पूरा होने की संभावित समय-सीमा सार्वजनिक करने के निर्देश दिए। यह भी कहा कि आदेश के पालन में कोई कठिनाई होने पर पक्षकार उचित आवेदन से फिर हाईकोर्ट आ सकते हैं।