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इंदौर के भंवरकुआं में आंदोलन कर रहे छात्रों को मुचलके पर छोड़ने के आदेश, पुलिस ने थोपी थी शर्त, हाईकोर्ट ने की खारिज

कोर्ट में दोनों की ओर से दलील दी गई कि सरकारी कर्मचारी अपनी नौकरी को लेकर ऐसी जमानत देने से हिचकेंगे, इसलिए यह शर्त व्यावहारिक रूप से दोनों की रिहाई क...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Sat, 25 Jul 2026 10:57:53 PM (IST)Updated Date: Sat, 25 Jul 2026 11:03:01 PM (IST)
इंदौर के भंवरकुआं में आंदोलन कर रहे छात्रों को मुचलके पर छोड़ने के आदेश, पुलिस ने थोपी थी शर्त, हाईकोर्ट ने की खारिज
इंदौर हाई कोर्ट बेंच।

HighLights

  1. छात्र नेताओं की जमानत के लिए पुलिस ने थोपी शर्त, इंदौर हाई कोर्ट ने कर दी खारिज।
  2. इंदौर के भंवरकुआं में आंदोलन कर रहे छात्रों को मुचलके पर रिहा करने के दिए आदेश।
  3. पुलिस ने जमानतदार सरकारी कर्मचारी होने की शर्त लगाई, कोर्ट ने कहा- यह मनमानी।

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। नीट पेपर लीक के खिलाफ नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के समर्थन में इंदौर के भंवरकुआं में आंदोलन कर रहे छात्र नेताओं को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने जमानत के लिए पुलिस की कड़ी शर्त से राहत दे दी। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने नेशनल एजुकेटेड यूथ यूनियन (एनईवाययू) के नेताओं को जमानत देते हुए पुलिस द्वारा लगाई गई जमानतदार (गारंटर) के सरकारी कर्मचारी होने की शर्त को खारिज करते हुए उसे मनमाना बताया।

प्रकरण में भंवरकुआं पर प्रदर्शन के दौरान 22 जुलाई को एनईवाययू के नेता राधेश्याम जाट और सुरेंद्र यादव को पुलिस ने हिरासत में लिया। दोनों 23 जुलाई को जुलूस निकालने की तैयारी में थे। उन्होंने पुलिस अनुमति मांगते हुए आवेदन किया था, लेकिन पुलिस ने एक रात पहले ही उन्हें उठा लिया था।


इसके खिलाफ हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी। इसकी सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कोर्ट में बताया गया कि दोनों को संज्ञेय अपराध करने के अंदेशे के चलते हिरासत में लिया गया है। पुलिस उन्हें रिहा करने को तैयार है, लेकिन वे जमानत के लिए एसीपी द्वारा तय शर्तों को पूरा नहीं कर रहे हैं।

एसीपी जोन-4 ने उनकी जमानत के लिए जो आदेश जारी किया था, वह भी कोर्ट में पेश किया गया, जिसमें उन्हें जमानत के लिए एक लाख रुपये की प्रतिभूति और एक लाख रुपये के बंधपत्र के साथ सरकारी कर्मचारी द्वारा जमानत देने पर रिहा करने की शर्त रखी गई थी। इसे पूरा नहीं करने पर उन्हें जेल भेजने का आदेश दिया गया था। इसके चलते उन्हें जेल भेज दिया गया था।

कोर्ट में दोनों की ओर से दलील दी गई कि सरकारी कर्मचारी अपनी नौकरी को लेकर ऐसी जमानत देने से हिचकेंगे, इसलिए यह शर्त व्यावहारिक रूप से दोनों की रिहाई को असंभव बना देती है। वहीं, सरकार की ओर से इन शर्तों को लेकर दलील दी गई कि वर्ष 2024 से उनके आचरण को देखते हुए ये शर्तें लगाई गई थीं।

वर्ष 2024 में दोनों ने हिंसक प्रदर्शन के जरिए शांति भंग करने का प्रयास किया था। कोर्ट ने कहा- जमानत की शर्त कठिन और बोझिल- हाई कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा है कि जमानत के लिए ऐसी कठिन और बोझिल शर्त नहीं लगाई जा सकती, जिसे पूरा करना व्यावहारिक रूप से संभव ही न हो।

कोर्ट ने कहा कि हिरासत में लिए गए व्यक्तियों की रिहाई के लिए किसी सरकारी कर्मचारी को जमानत देने की अनिवार्य शर्त लगाना असल में जमानत से इन्कार करने के समान है। कोर्ट ने दोनों छात्र नेताओं को राहत देते हुए 50-50 हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक-एक सक्षम जमानतदार की संतुष्टि पर जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।