इंदौर। 20 साल पहले बंद हो चुकी उज्जैन की विनोद मिल के सवा चार हजार से ज्यादा मजदूरों को बुधवार को हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिल गई। कोर्ट ने मिल की जमीन को लेकर सरकार की ओर से दायर अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने माना कि जमीन पर कभी शासन का कब्जा था ही नहीं।

इस फैसले के बाद मिल की जमीन बेचकर मजदूरों को 67 करोड़ रुपए का भुगतान करने का रास्ता साफ हो गया। सिंगल बेंच ने 2004 में जमीन बेचने पर मुहर लगा दी थी। सरकार ने इसे चुनौती देते हुए अपील दायर की थी।

विनोद मिल 1996 में बंद कर दिया गया था।

इसके बाद से इसके 4353 मजदूर ग्रेजुएटी, वेतन और अन्य भुगतान के लिए भटक रहे हैं। मिल की करीब 82 बीघा जमीन को लेकर भी शासन और परिसमापक (ओएल) के बीच विवाद चल रहा था। मिल के मजदूर भी इसमें पक्षकार हैं। 12 जनवरी 2004 को सिंगल बेंच ने मिल की जमीन बेचने का आदेश दिया था। इसे चुनौती देते हुए शासन ने डिविजनल बेंच में अपील दायर की।

बुधवार को जस्टिस एससी शर्मा और जस्टिस राजीवकुमार दुबे ने शासन की अपील खारिज कर दी। कोर्ट के इस फैसले के बाद मिल की जमीन बेचने का रास्ता साफ हो गया।

जमीन को लेकर दायर शासन की अपील की सुनवाई के दौरान ही मजदूरों ने अपने भुगतान को लेकर हाई कोर्ट में अलग से याचिका दायर कर दी। 2012 में कोर्ट ने मजदूरों का 67 करोड़ रुपए का क्लेम स्वीकारते हुए मिल की संपत्ति बेचकर उन्हें इसका भुगतान करने का आदेश दे दिया। मिल की मशीनरी और अन्य संपदा बेचकर इसमें से करीब 17 प्रतिशत भुगतान 2012 में कर भी दिया गया।

बाकी रकम के लिए मजदूर सालों से कोर्ट के चक्कर काट रहे थे। मजदूरों की ओर से पैरवी करने वाले एडवोकेट धीरेंद्रसिंह पवार ने बताया कि सरकार की अपील खारिज होने के बाद मिल के जमीन बेचकर मजदूरों के किए जाने वाले 67 करोड़ के भुगतान को हरी झंडी मिल गई। अब परिसमापक जमीन बेचकर इसका भुगतान कर सकेंगे।

ग्वालियर स्टेट से मिली थी जमीन

पवार के मुताबिक मिल को 82 एकड़ जमीन ग्वालियर स्टेट से मिली थी। दान में मिली इस जमीन को वापस लेने का कोई प्रावधान नहीं था। यह शर्त जरूर थी कि मिल चाहे तो उसे लौटा सकती है। मिल बंद होने के बाद सरकार जमीन पर अपना कब्जा जताने लगी। सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ दायर सरकार की अपील 2004 से लंबित थी। कभी दस्तावेजों की कमी की वजह से तो कभी नंबर नहीं आने की वजह से इसकी सुनवाई टलती रही।