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इंदौर-उज्जैन मेट्रोपॉलिटन अधिसूचना पर हाई कोर्ट सख्त, शासन नहीं दे सका जवाब, कोर्ट ने दिया चार सप्ताह का समय

शासन को बताना था कि मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी के लागू होने के बाद नगर निगम के अधिकारों पर क्या असर पड़ेगा और अथॉरिटी के अस्तित्व में आने के बाद नगर निगम की...और पढ़ें

By Kuldeep BhawsarEdited By: Dheeraj Belwal
Publish Date: Tue, 18 Aug 2026 04:43:13 PM (IST)Updated Date: Tue, 18 Aug 2026 04:43:13 PM (IST)
इंदौर-उज्जैन मेट्रोपॉलिटन अधिसूचना पर हाई कोर्ट सख्त, शासन नहीं दे सका जवाब, कोर्ट ने दिया चार सप्ताह का समय
इंदौर-उज्जैन मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र अधिसूचना को चुनौती। (AI Generated Image)

HighLights

  1. इंदौर-उज्जैन मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र अधिसूचना को चुनौती
  2. नगर निगम के अधिकारों पर हाईकोर्ट ने मांगा जवाब
  3. जनहित याचिका में चुनौती के बाद सरकार से जवाब

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। उज्जैन-इंदौर मेट्रोपालिटन क्षेत्र को लेकर जारी अधिसूचना को चुनौती देने वाली जनहित याचिका में मंगलवार को सुनवाई हुई। शासन को बताना था कि मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी के लागू होने के बाद नगर निगम के अधिकारों पर क्या असर पड़ेगा और अथॉरिटी के अस्तित्व में आने के बाद नगर निगम की स्थिति क्या रहेगी, लेकिन वह नहीं बता सका। सरकारी वकील ने इसके लिए समय मांग लिया। मामले में अब चार सप्ताह बाद फिर सुनवाई होगी।

मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी के गठन से नगर निगम के अधिकार सीमित होने का आरोप

हाई कोर्ट में यह जनहित याचिका एडवोकेट अक्षत पहाडिया ने दायर की है। कहा है कि मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी के अस्तित्व के बाद नगर निगम के अधिकार सीमित हो जाएंगे। मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में शामिल इलाकों में विकास और उसकी निगरानी, रख-रखाव के काम अथॉरिटी के पास चले जाएंगे, निगम के पास केवल साफ-सफाई और छोटे-मोटे काम ही रहेंगे। याचिका में मेट्रोपॉलिटन परियोजना, एक्ट की धारा तीन जिसमें मेट्रोपॉलिटन का क्षेत्र तय किया गया है को चुनौती दी गई है।


कहा है कि नियमों के हिसाब से पहले धारा-3 में जनता और इसमें शामिल होने वाले क्षेत्रों के नगर निगम, नगरीय निकायों और ग्राम पंचायतों, जिला पंचायत आदि से सहमति लेना जरूरी है, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के प्रारंभिक तर्क सुनने के बाद शासन से इस मामले में जवाब देने को कहा है।

ये हैं याचिका के प्रमुख बिंदु

अधिसूचना संविधान के 74वें संशोधन की मंशा के विरुद्ध है। मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में जिन स्थानीय निकायों को शामिल किया गया है उससे चर्चा भी नहीं की गई न ही उनके सुझाव लिए गए। इस अधिसूचना के मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में उज्जैन और इंदौर को शामिल किया गया है, लेकिन इन दोनों शहरों की प्रकृति अलग-अलग है, इस पर भी विचार नहीं किया गया है।

कानूनन जो भी मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र होगा उसके लिए कमेटी बनेगी। इस कमेटी के सदस्यों में दो तिहाई संख्या उन क्षेत्रों के जनप्रतिनिधियों की रहेगी जो मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में शामिल हो रहे हैं। जबकि इस अधिसूचना में ऐसा नहीं किया गया है। सरकार ने इसके लिए अलग से अथॉरिटी बनाई है। इसके मुखिया मुख्यमंत्री, सदस्य मंत्री और प्रशासन के अधिकारी रहेंगे। शासन की इस मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र कमेटी में इसमें आने वाले क्षेत्रों के दो सदस्यों अथॉरिटी में शामिल किया जा रहा है।

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अधिसूचना के मुताबिक इस अथॉरिटी को पूरी शक्तियां दे दी गई हैं। एक मेट्रोपॉलिटन कमेटी बनाने की बात कही गई है, लेकिन इसे कोई शक्ति नहीं दी गई। नियमानुसार पहले मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में शामिल क्षेत्र को परिभाषित किया जाना था फिर अधिसूचना जारी की जाना थी, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया।

मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में इलाकों को शामिल करने से पहले वहां के जनप्रतिनिधियों का पक्ष नहीं लिया गया। स्थानीय निकाय जैसे पंचायत, नगर निगम से सहमति, सुझाव और आपत्तियां नहीं ली गई। इस तरह से जनप्रतिनिधियों की संवैधानिक शक्तियां कम हो जाएगी। यह संविधान के प्रविधानों के विरुद्ध है।