
History Of Indore: इंदौर। इंदौर में रेलवे के आगमन की एक दिलचस्प कहानी है। उससे भी दिलचस्प बात है कि इसे किस तरह यहां मूर्तरूप दिया गया। शहर में रेलवे ट्रेक का निर्माण और यहां ट्रेन की आवाजाही का श्रेय तुकोजीराव होलकर द्वितीय को जाता है। तुकोजीराव शहर में इस सौगात को लाने के लिए बहुत उत्सुक थे। वे चाहते थे कि इंदौर को खंडवा और राजपूताना से रेल द्वारा जोड़ा जाए।
इस ध्येय की पूर्ति के लिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार से करीब पांच-छह साल तक पत्राचार किया। तब देश में रेलवे पर ब्रिटिश सरकार का एकाधिकार था। तुकोजीराव होलकर की मांग को महत्व देते हुए प्रस्तावित रेलवे लाइन पर चर्चा करने के लिए सन् 1863 में ब्रिटिशर्स ने एएस आर्टन को इंदौर भेजा। सहमति तो बनी, लेकिन चुनौती खंडवा से इंदौर के बीच आने वाली सतपुड़ा और विंध्याचल पर्वतमाला, घना जंगल व नर्मदा का चौड़ा पाट थे। इसके अलावा बिटिशर्स के समक्ष पैसों की भी समस्या थी। इस बात के लिए महाराजा को रजामंद भी करना था।
शहर के विकास को देखते हुए उन्होंने ब्रिटिशर्स को ऋण देने की बात स्वीकारी और सन् 1869 में होलकर शासन द्वारा द्वारा रेलवे लाइन बनाने के लिए ब्रिटिश सरकार को एक करोड़ रुपये का ऋण देने पर सहमति बनी। यह ऋण साढ़े चार प्रतिशत की वार्षिक ब्याज दर पर 101 वर्षों में चुकाने की शर्त पर दिया गया। एक शर्त यह भी थी कि ब्याज के भुगतान के बाद जो भी लाभ होगा, उसका आधा अंश होलकर महाराज को दिया जाएगा।
कहा जाता है कि इस समस्या के साथ दूसरी समस्या यह भी थी कि रेल के इंजन, पटरी आदि कैसे लाई जाएं। कुछ लोगों का कहना है कि इस कार्य के लिए हाथी का उपयोग किया गया। हाथियों की मदद से इंजन, रेल की पटरी आदि एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाई गईं। खंडवा के लिए ग्रेटर इंडियन पेनिनसुला रेलवे (जीआइपी) से मोरटक्का तक रेलवे लाइन परियोजना वर्ष 1872 में पूरी कर दी गई। इसी वर्ष वायसराय लार्ड नार्थब्रुक बड़वाह में नर्मदा पर पुल की आधारशिला रखने पहुंचे थे। मोरटक्का से रेल लाइन
आखिरकार वर्ष 1878 में इंदौर पहुंची। यह वास्तव में एक बहुत ही कठिन काम था क्योंकि कालाकुंड से पातालपानी तक का घाट बहुद दुष्कर हुआ करता था। इसमें 8.8 डिग्री के विपरीत मोड़ के साथ बहुत तेज ढलान भी थी। इस परियोजना को पूरा करते समय पहाड़ों के मध्य से चार सुरंगें खोदी गईं। इंदौर को बाद में राजपुताना रेलवे के साथ भी जोड़ा गया और उसे राजपुताना-मालवा रेलवे नाम दिया गया।
यद्यपि होलकर स्टेट के साथ हुए समझौते के अनुसार इसका नाम होलकर स्टेट रेलवे रखा जाना था। 44 वर्षों तक यह मामला चला और ब्रिटिश सरकार ने हार मानी। आखिरकार फैसला होलकर स्टेट के पक्ष में हुआ।