
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। यूरिया के अंधाधुंध उपयोग से मिट्टी की बिगड़ती सेहत को लेकर केंद्र सरकार ने भले ही खेत बचाओ अभियान शुरू किया हो, लेकिन कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि समाधान खेत के साथ घर में भी छिपा है। रसोई से निकलने वाले जैविक कचरे, गोबर और फसल अवशेषों का सही उपयोग कर न केवल रासायनिक खाद पर निर्भरता कम की जा सकती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी वापस लाई जा सकती है।
सेवानिवृत्त कृषि वैज्ञानिक डॉ. सतीश परसाई के अनुसार, किसानों को सबसे पहले उर्वरकों के संतुलित उपयोग की आदत विकसित करनी होगी। फसलों के लिए नाइट्रोजन (एन), फास्फोरस (पी) और पोटाश (के) का आदर्श अनुपात 4:2:1 माना जाता है। यदि किसान इसी अनुपात में उर्वरकों का उपयोग करें तो मिट्टी पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ेगा और उत्पादन भी संतुलित रहेगा। वर्तमान में अधिकांश क्षेत्रों में यूरिया का उपयोग जरूरत से कहीं अधिक हो रहा है, जिससे मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जैव उर्वरकों का उपयोग अभी भी बहुत कम है। जबकि यह मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ाते हैं और लंबे समय तक भूमि की उत्पादकता बनाए रखते हैं। किसानों को रासायनिक खाद के साथ जैव उर्वरकों का उपयोग बढ़ाना चाहिए।
डॉ. परसाई के अनुसार जिन किसानों के पास पशुधन है, वे गोबर गैस संयंत्र स्थापित कर दोहरा लाभ ले सकते हैं। एक ओर घरेलू ईंधन मिलेगा, वहीं दूसरी ओर संयंत्र से निकलने वाली स्लरी उच्च गुणवत्ता की जैविक खाद के रूप में खेतों में उपयोग की जा सकेगी। इससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होगी और मिट्टी की संरचना भी बेहतर होगी।
पत्तियां, खरपतवार, फसल अवशेष, सब्जियों और फलों के छिलके तथा अन्य जैविक कचरे से नाडेप विधि के माध्यम से आसानी से खाद तैयार की जा सकती है। इस विधि में ईंटों की टंकी या नाद में जैविक सामग्री भरकर उसमें थोड़ी मात्रा में गोबर और पानी मिलाया जाता है। कुछ महीनों में यह उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद में बदल जाती है। सरकार भी इस तरह की खाद इकाइयों पर अनुदान उपलब्ध कराती है।
मिट्टी को सिर्फ रासायनिक खाद नहीं, जैविक पोषण भी चाहिए। खेत और घर से निकलने वाले जैविक संसाधनों का उपयोग बढ़ाकर किसान मिट्टी की सेहत सुधार सकते हैं और लागत भी घटा सकते हैं।- डॉ. सतीश परसाई, पूर्व कृषि विज्ञानिक।