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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 10, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Indian Freedom Struggle: इंदौर की मिलों की झांकी में भी दिखती थी स्वतंत्रता की दीवानगी

Indian Freedom Struggle: अनंत चतुर्दशी की रात मिलों से निकलने वाली झांकी भी सहायक बनती थी।

By Prashant PandeyEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Wed, 10 Aug 2022 02:24:28 PM (IST)Updated Date: Wed, 10 Aug 2022 02:28:52 PM (IST)
Indian Freedom Struggle: इंदौर की मिलों की झांकी में भी दिखती थी स्वतंत्रता की दीवानगी

Indian Freedom Struggle: इंदौर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। स्वतंत्रता संग्राम की मशाल उस दौर में पूरे देश में समान रूप से जल रही थी। इस शहर ने भी स्वतंत्रता के लिए कई सभाओं को देखा, कई प्रयास किए, कई बार जनचेतना के बिगुल बजाए। यहां होलकर शासकों ने अपने स्तर पर प्रयास किया तो लोकनायकों ने भी भरसक कोशिश की। कला संस्कृति के इस शहर में कला के जरिए भी स्वतंत्रता की आवाज बुलंद की गई, फिर चाहे वह मिलों से निकलने वाली झांकी हो या श्रीमध्यभारत हिंदी साहित्य समिति में हुई महात्मा गांधी की सभा। देश की स्वतंत्रता के लिए हुए प्रयासों को जिन्होंने करीब से देखा उन्हीं की जुबानी उन बातों को हम आप तक पहुंचा रहे हैं।

घर में अक्सर होती थी आंदोलन की गोपनीय सभा

कथक गुरु पद्मश्री डा. पुरू दाधीच बताते हैं कि 1940 के करीब देश द्वितीय विश्वयुद्ध और प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा था बावजूद स्वतंत्रता को लेकर लोगों के जोश में कोई कमी नहीं थी। यहां भी सत्याग्रह का दौर जारी था देश के दीवाने स्वेच्छा से गिरफ्तार भी हो रहे थे। देश में ज्वार की फसल बर्बाद हो चुकी थी और भरपेट राशन भी बमुश्किल मिल पाता था। ऐसे में मृत्युभोज-विवाह आदि अवसर पर सिंघाड़े के आटे की पूड़ी बनाकर खिलाई जाती थी और उसकी भी जांच हो जाती थी। मुझे याद है शहर में सुभाष चौक पर सभाएं होती थीं जिसके माध्यम से जनचेतना फैलाई जाती थी।


चूंकि राजवाड़े पर होलकर शासक थे इसलिए अंग्रेजों का वहां पहुंचना सहज नहीं था। उस दौर में अनंत चतुर्दशी की रात मिलों से निकलने वाली झांकी भी सहायक बनती थी। देव लीलाओं की झांकियों के बीच में कुछ झांकियां ऐसी भी होती थीं जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान दर्शाकर लोगों में जोश का संचार कर देती थी। उस वक्त कन्हैयालाल खादीवाला, बाबूलाल पाटौदी आदि के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आगे बढ़ते थे।

मजदूरों का नेतृत्व करने वाले श्याम सुंदर यादव 1944 में उत्तर प्रदेश से पिता रामशरण के साथ इंदौर आए थे। पिता भंडारी मिल में कार्य करते थे। उत्तर प्रदेश से शहर आते वक्त रास्ते में एक सभा हो रही थी जिसमें लोग देशभक्ति के नारे लगा रहे थे। पिता और फूफा सुखनंदन भी उसमें शामिल हो गए। वहां गिरफ्तारियां भी हुईं। फूफाजी ने पिता को वहां से जाने पर विवश कर दिया और खुद गिरफ्तार हो गए। वे कई महीनों तक जेल में रहे। तब लोगों को गिरफ्तार करने के लिए हथकड़ियां नहीं लगाई जाती थीं केवल रस्सी से घेरा बना दिया जाता था। लोग भी स्वेच्छा से गिरफ्तारी देते थे। इंदौर में पिता के साथ मैं एक बार महात्मा गांधी की सभा में भी गया जो कि बिस्को पार्क (वर्तमान का नेहरू पार्क) में हुई थी। घर में अक्सर आंदोलन की गोपनीय सभा होती थी। सभा इतनी गोपनीय होती थी कि यदि हम बच्चे भी गलती से सामने आ जाते तो बड़े लोग चुप हो जाते और हमें पैसे देकर बाजार भेज देते थे।