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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 08, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Indore News: 'समान नागरिक संहिता को मजहब के चश्मे से न देखें'

Indore News: श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति में विद्वानों ने किया मंथन, कहा- देश में एकरूपता लाने के लिए समान नागरिक संहिता जरूरी।

By Hemraj YadavEdited By: Hemraj Yadav
Publish Date: Sat, 08 Jul 2023 01:21:47 PM (IST)Updated Date: Sat, 08 Jul 2023 01:21:47 PM (IST)
Indore News: 'समान नागरिक संहिता को मजहब के चश्मे से न देखें'

Indore News: इंदौर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। कानून और धर्म दो अलग-अलग पहलू हैं। इनका आपस में सामाजिक रूप से संबंध हो सकता है, लेकिन कानूनी रूप से कोई संबंध नहीं हो सकता। व्यक्तिगत कानून में एकरूपता लाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है और भारतीय संविधान इसका प्रविधान करता है। हमारे संविधान में विभिन्न धर्मों में अलग-अलग कानूनों का प्रविधान किया गया है, जिसमें एकरूपता लाने की आवश्यकता है। अनुच्छेद 25 समानता की बात करता है, लेकिन देश में यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि समान नागरिक संहिता एक मजहब के लोगों को उनके अधिकारों से वंचित कर देगी। ऐसा भ्रम फैलाया जाना ठीक नहीं है।

यह बात वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व सहायक सोलिसीटर जनरल विनय झेलावत ने कही। वे श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति के समसामयिक अध्ययन केंद्र द्वारा आयोजित विचार मंथन में बतौर मुख्य वक्ता उपस्थित थे। समान नागरिक संहिता लागू करने की आवश्यकता विषय पर उन्होंने कहा कि वर्तमान में इस विषय पर पूरे देश में चर्चाएं हो रही हैं। इस पर मंथन होना ही चाहिए, किंतु हमारा संविधान स्पष्ट करता है कि सबको समानता का अधिकार मिलना चाहिए। धर्म और कानून, यह दोनों पृथक हैं। इनको आपस में जोड़कर जो भ्रम फैलाने के काम किए जा रहे हैं, वह गलत है।


जहां खामियां है, वहां सुधार जरूरी

झेलावत ने कहा, जिन भी धर्मों के कानूनों में कुछ खामियां हैं, चाहे वह हिंदू हों, मुसलमान हों, ईसाई हों या कोई अन्य, उनमें सुधार करना ही चाहिए। विशेषकर उत्तराधिकार, नाबालिग संरक्षण और स्त्रियों की स्थिति आदि के मामलों में तो यह अनिवार्य है। कार्यक्रम में अतिथियों का परिचय केंद्र मंत्री डा. मीनाक्षी स्वामी ने दिया। स्वागत श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति के प्रधानमंत्री अरविंद जवलेकर ने किया। इस अवसर पर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, न्यायमूर्ति वीडी ज्ञानी, गिरेंद्रसिंह भदौरिया, रामचंद्र अवस्थी और त्र्यंबक चांदोरकर सहित अन्य उपस्थित रहे।

संहिता को हर नागरिक समझे

सामाजिक कार्यकर्ता डा. वंचना सिंह परिहार ने कहा कि ईश्वर ने सबको एक समान जीवन और जीवनशैली दी है। इसके बावजूद पुरुष सत्तात्मक युग में अत्याचार हुए और दुर्भाग्य से आज भी हो रहे हैं। इन पर रोक लगाने के लिए भारत में समान नागरिक संहिता का होना अत्यंत आवश्यक है। समाज के प्रत्येक नागरिक को चाहिए कि इस संहिता के हर बिंदु को गहराई समझें, ताकि कोई उन्हें अपनी राजनीतिक, धार्मिक या सामाजिक हित के लिए बरगला न सके।

देश को एकसूत्र में पिरोने की जरूरत

मप्र वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता आलमगीर खान गौरी ने कहा कि मुस्लिम लोगों के लिए इस्लाम की बात की जाती है। उसमें गलत कामों के लिए बहुत कठोर दंड देने की व्यवस्थाएं की गई हैं, मगर ऐसा हो कहां रहा है। हम अपनी सुविधा के अनुसार कानून स्वीकार कर लेते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस देश में लंबे समय तक मुगलों का शासन रहा है, यह देश मुसलमानों का भी है, इसलिए समान नागरिक संहिता के माध्यम से भ्रांतियों को दूर कर देश को एकसूत्र में पिरोया जाना चाहिए।