
लाइफस्टाइल डेस्क। भिया! अगर आप खाने-पीने के शौकीन हो और अपने 'गजब' मध्य प्रदेश में हो, तो यहां का इतिहास सिर्फ किताबों में नी मिलता, बल्कि कड़ाही की खुशबू और मसालों की 'चटाख' में भी मिलता है।
इस कहानी में हम आपको ले जा रये हैं अपने इंदौर (Indore Sarafa Bazaar Night Food) के उस अनूठे बाजार में, जहां सूरज ढलने के बाद एक नया सूरज उगता है - अपना 'सराफा बाजार'। भिया, यहां रात को जो रौनक जमती है न, वो देख के आप भी बोल उठोगे—"खाओ तो सराफा, नी तो सब सफा!"

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यह दुनिया का शायद इकलौता ऐसा बाजार है, जहां दिन में करोड़ों के हीरों का व्यापार होता है और रात में चटोरेपन का मेला लगता है।
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इंदौर के जायकों की नींव 18वीं सदी में रानी अहिल्याबाई होलकर के समय ही पड़ गई थी। होलकर घराना अपनी 'वेस्टर्न आउटलुक' के लिए जाना जाता था। यहां के महाराजाओं का विदेशों में काफी समय बीतता था, जिसके कारण इंदौर के दस्तरखान पर फ्रेंच और ब्रिटिश प्रभाव साफ दिखने लगा। रसोइयों में नायाब पुलाव, रायते और साग की ऐसी जुगलबंदी हुई कि हिंदुस्तानी खाने को पेश करने की एक नई और खूबसूरत कला विकसित हुई।

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सर्राफा बाजार का रात में 'फूड हब' बनने का इतिहास बड़ा दिलचस्प है। दिन भर यहां जौहरी अपना काम करते थे। जो लोग कीमती जेवरात नहीं खरीद सकते थे, वे केवल बाजार की रौनक देखने पहुंचते थे। इन 'विंडो शॉपिंग' करने वालों के लिए धीरे-धीरे छोटे-छोटे खाने के ठिकाने लगने लगे। दस्तूर यह बना कि रात को जब जौहरियों की दुकानें बंद होतीं, तो उनके शटर के आगे 'खाऊ गली' गुलजार हो जाती। आज भी यहां रात के 1:00 बजे तक मेला लगा रहता है।
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भुट्टे का कीस: यह मालवा की सबसे खास पहचान है। देसी घी में भुट्टे को किसकर (घिसकर) तैयार की गई यह डिश होलकर घराने की मेहमान-नवाजी का हिस्सा रही है।
गराडू: कड़ाके की ठंड में इंदौर की पहचान है 'गराडू'। यह एक प्रकार का जमीकंद है, जिसे तेल में डीप फ्राई कर अमचूर, काले नमक और खास मसालों के साथ परोसा जाता है। इसे खाने के लिए लोग देश के कोने-कोने से आते हैं।
जोशी जी के दही-बड़े: सराफा का सफर तब तक अधूरा है, जब तक आप 'जोशी जी' के दही-बड़े न चखें। यहां दही-बड़े सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि उन्हें हवा में उछालने की कला और चटपटी बातों का भी जायका है।
इंदौर से बाहर निकलें तो मध्य प्रदेश का सबसे प्रसिद्ध 'दाल-बाफला' मिलता है। क्या आप जानते हैं कि यह कभी व्यापारियों का 'सफरी खाना' हुआ करता था? चूंकि बाफला हफ्ते भर तक खराब नहीं होता था, इसलिए पुराने समय में लोग इसे लंबी यात्राओं पर साथ ले जाते थे।

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मध्य प्रदेश के स्वादों की यह फेहरिस्त काफी लंबी है। अगले अंक में हम आपको ले चलेंगे भोपाल के जहानुमा घराने की नवाबी रसोइयों में, जहां 'भोपाली पसंदे' और 'रसाल' जैसी अनसुनी डिशेज का इतिहास आज भी जिंदा है।