35 साल की ललिता उजले साल 2015 से कैब चला रही हैं। ललिता ने बताया कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने से मैं सोसायटी में काम तलाशने गई थी। मैंने यहां लड़कियों की देखभाल का काम मांगा था। वहां संयोगवश मुझे कार चलाने के लिए आफर किया गया। हालांकि बचपन से ही मेरा कार चलाने का सपना था। आफर मिलते ही मैंने तुरंत स्वीकार कर लिया। 2015 में मैंने ड्राइविंग सीखी, वहीं एक साल बाद कई महिलाओं को ड्राइविंग सिखाई। इस साल से मैंने कैब चलाना शुरू किया है। शुरुआत में महिलाओं का काफी सहयोग मिलता था लेकिन पुरुष काफी मनोबल को गिराते थे। किंतु धीरे-धीरे जब मैं इसमें सफल होती गई तो लोग विश्वास करने लगे। मेरा 16 साल बेटा भी मुझसे कहता है कि मुझे भी ड्राइविंग सिखा दो, जरूरत पड़ने पर काम आऊंगा।
ट्रेनों की सेहत इनके हाथ में
सीनियर तकनीशियन मधुबाला मोनिया 1992 से ट्रेनों का रखरखाव कर रही हैं। वे बताती हैं कि पहली पोस्टिंग चित्तौड़गढ़ में थी। जिसके बाद इंदौर कोचिंग डिपो आई। उस समय यहां मैं अकेली महिला तकनीशियन थी। लेकिन साथ काम करने वाले अन्य कर्मचारियों का भरपूर सहयोग मिला। हम यहां सिक लाइन, जहां कोच रिपेयर होने के लिए आते हैं, में काम करते हैं। यहां पर कोच से ट्राली अलग करना, व्हील बदलना, स्प्रिंग बदला आदि काम करते हैं। सभी उपकरण काफी वजनी होते हैं, इसलिए लिफ्ट की मदद ली जाती है।
काम देख पिता ने मना किया था
सहायक तकनीशियन वंदना पाटीदार ने बताया किसी बड़ी कंपनी में जाब करने से बेहतर सरकारी नौकरी करना है। इसलिए रेलवे की ग्रुप डी की परीक्षा पास की। पहली बार जब पिता के साथ यहां काम करने आई तो पिता ने देखा कि यहां तो भारी उपकरण भी उठाने पड़ते हैं। ट्रेनों के नीचे काम करना पड़ता है। यह देख पिता ने काम करने से मना कर दिया था लेकिन मम्मी ने बात संभाली। यहां हर दिन काम के दौरान कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। अब तो आदत हो गई है।
बहुत मेहनत से पाई पोस्ट
सहायक तकनीशियन एकता शम्मी ने बताया कि इस पोस्ट के लिए काफी मेहनत की थी। अभी ज्वाइन किए ज्यादा समय नहीं हुआ है। पिटलाइन पर रखरखाव के लिए आने वाली ट्रेनों में आयल लेवल चेक करना, सीटों का कवर बदला, पर्दे बदलना, नटबोल्ड बदलना, उपकरण यहां से वहां रखना आदि काम किए जाते हैं। यह जिम्मेदारी का काम है, इसलिए जरा सी भी चूक नहीं की जा सकती है।