जमानत में व्यक्तिगत नैतिकता नहीं थोप सकते न्यायाधीश : सुप्रीम कोर्ट, रतलाम के यौन शोषण मामले में इंदौर हाई कोर्ट का आदेश रद
जमानत के मामले में न्यायाधीश अपने व्यक्तिगत नैतिक विचार अथवा मूल्य-निर्णय को आधार नहीं बना सकते। जमानत पर निर्णय लेते समय न्यायालय को कानून और मामले स...और पढ़ें
Publish Date: Sun, 27 Sep 2026 05:49:33 PM (IST)Updated Date: Sun, 27 Sep 2026 05:49:33 PM (IST)
कोर्ट ने जारी किया निर्देश। (प्रतीकात्मक तस्वीर)HighLights
- सामाजिक व्यवस्था और पीड़ित परिवार की नैतिकता को आधार बनाने पर की टिप्पणी
- जमानत पर निर्णय लेते समय कानून और मामले से जुड़े न्यायिक पहलुओं पर विचार करना चाहिए
- व्यक्तिगत नैतिक धारणाओं को न्यायिक निर्णय का आधार नहीं बनाया जा सकता
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। जमानत के मामले में न्यायाधीश अपने व्यक्तिगत नैतिक विचार अथवा मूल्य-निर्णय को आधार नहीं बना सकते। जमानत पर निर्णय लेते समय न्यायालय को कानून और मामले से जुड़े न्यायिक पहलुओं पर विचार करना चाहिए।
यह महत्वपूर्ण टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने रतलाम से जुड़े यौन शोषण के मामले में की है। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ का जमानत से इन्कार करने वाला आदेश रद करते हुए आरोपित को जमानत देने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि न्यायालयों को जमानत के मामले में ही नहीं, बल्कि किसी आरोपित के आपराधिक मुकदमे की सुनवाई के दौरान भी न्यायाधीश के व्यक्तिगत विचार अथवा नैतिकता संबंधी मूल्य-निर्णय थोपने से बचना चाहिए। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि व्यक्तिगत नैतिक धारणाओं को न्यायिक निर्णय का आधार नहीं बनाया जा सकता।
पड़ोसी द्वारा यौन अपराध का मामला
मामला रतलाम के स्टेशन रोड थाने में दर्ज प्रकरण से जुड़ा है। पुलिस ने कान्हा उर्फ कन्हैया सिंह के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, पाक्सो अधिनियम और एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं में प्रकरण दर्ज किया था। उसे 10 सितंबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था। अभियोजन के अनुसार आरोपित पीड़िता के परिवार के पड़ोस में किराये से रहता था। आरोप है कि उसने नाबालिग का करीब एक माह तक यौन शोषण किया।
आरोपित ने जमानत के लिए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ का रुख किया था। हाई कोर्ट ने 20 मार्च 2026 को उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
हाई कोर्ट ने पीड़ित परिवार की प्रतिष्ठा को माना था महत्वपूर्ण आधार
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश का परीक्षण करते हुए पाया कि जमानत से इन्कार करने के कारणों में सामाजिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका के साथ पीड़ित परिवार की नैतिकता से जुड़ी चिंताओं को भी महत्व दिया गया था। हाई कोर्ट ने आरोपित की रिहाई के संभावित सामाजिक प्रभाव और पीड़ित परिवार की नैतिकता-सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़े पहलुओं पर भी विचार किया था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि न्यायिक निर्णय में व्यक्तिगत नैतिकता और कानून के आधार पर किए जाने वाले न्यायिक मूल्यांकन के बीच स्पष्ट अंतर रखा जाना चाहिए।
एक साल से अधिक समय से जेल में था
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपित सितंबर 2025 से हिरासत में था और मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में समय लग सकता है। इन परिस्थितियों को देखते हुए पीठ ने हाई कोर्ट के 20 मार्च के आदेश को रद कर दिया और आरोपित को संबंधित विशेष न्यायालय के समक्ष पेश कर उचित शर्तों पर जमानत देने का निर्देश दिया।