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'वकील की गलती की सजा पक्षकार को नहीं दी जा सकती', MP हाईकोर्ट ने 14 साल बाद निरस्त किया फैसला

MP High Court: अधिवक्ता के जूनियर ने प्रकरण की तारीख दर्ज करते समय गलती से दूसरे प्रकरण की जानकारी अपनी डायरी में दर्ज कर ली थी।

By Kuldeep BhawsarEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Thu, 24 Sep 2026 02:15:56 PM (IST)Updated Date: Thu, 24 Sep 2026 02:24:52 PM (IST)
'वकील की गलती की सजा पक्षकार को नहीं दी जा सकती', MP हाईकोर्ट ने 14 साल बाद निरस्त किया फैसला
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ। - फाइल फोटो

HighLights

  1. अधिवक्ता के जूनियर ने गलती से दूसरे प्रकरण की जानकारी अपनी डायरी में दर्ज कर ली
  2. जूनियर वकील ने स्वयं कोर्ट के समक्ष उपस्थित होकर गवाही दी और अपनी गलती की पुष्टि भी की
  3. हाईकोर्ट ने माना यह जानबूझकर की गई लापरवाही के बजाय सद्भाविक रूप से हुई मानवीय भूल है

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। एडवोकेट या उनके साथ काम करने वाले किसी जूनियर एडवोकेट द्वारा की गई मानवीय भूल के संबंध में हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि अधिवक्ता द्वारा की गई मानवीय भूल का खामियाजा पक्षकार को नहीं भुगताया जा सकता।

हाई कोर्ट ने 14 वर्ष पुराने मामले में जिला कोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले को निरस्त कर दिया। न्यायमूर्ति विनय सराफ ने जिला कोर्ट से कहा है कि वह मामले में उसी स्तर से दोबारा सुनवाई करे, जहां वह फैसले के वक्त था।


एडवोकेट रेखा श्रीवास्तव ने बताया कि मामला पारसी मोहल्ले के एक मकान से जुड़ा है। रंजीत नारायण हक्सर ने योगेंद्र कुमार चड्ढा के विरुद्ध एक केस दायर किया था। आरोप था कि मकान का निर्माण स्वीकृत नक्शे के विरुद्ध किया गया है। 28 जून 2010 को प्रकरण सुनवाई के लिए नियत था, लेकिन चड्ढा और उनके अधिवक्ता कोर्ट में उपस्थित नहीं हो सके।

इस पर कोर्ट ने एक पक्षीय कार्रवाई करते हुए 29 सितंबर 2010 को उनके विरुद्ध फैसला सुना दिया। चड्ढा के अधिवक्ता को एकपक्षीय फैसले की जानकारी पांच अक्टूबर 2010 को लगी। इसके एक दिन बाद ही छह अक्टूबर को उन्होंने इस फैसले को निरस्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर दिया। कोर्ट को बताया कि 28 जून 2010 को जिला कोर्ट में हक्सर का एक अन्य मामला भी सूचीबद्ध था।

मानवीय भूल है

अधिवक्ता के जूनियर ने प्रकरण की तारीख दर्ज करते समय गलती से दूसरे प्रकरण की जानकारी अपनी डायरी में दर्ज कर ली थी। जूनियर वकील ने स्वयं कोर्ट के समक्ष उपस्थित होकर गवाही दी और अपनी गलती की पुष्टि भी की। इसके साथ ही गलती से संबंधित साक्ष्य भी प्रस्तुत किए गए।

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इसके बावजूद जिला कोर्ट ने आवेदन निरस्त कर दिया। इस पर अपील हाई कोर्ट पहुंची। हाई कोर्ट ने परिस्थितियों और रिकार्ड का परीक्षण करने के बाद माना कि यह जानबूझकर की गई लापरवाही के बजाय सद्भाविक रूप से हुई मानवीय भूल है।

कोर्ट ने कहा कि न्याय का उद्देश्य केवल प्रक्रिया का कठोर पालन कराना नहीं, बल्कि पक्षकार को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना भी है। सिर्फ तकनीकी भूल की वजह से एक पक्षकार को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने एकपक्षीय निर्णय को निरस्त करते हुए मामले की दोबारा सुनवाई करने के आदेश जिला कोर्ट को दिए।

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