
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। चेक बाउंस के मामलों में शिकायतकर्ता के लिए महत्वपूर्ण कानूनी राहत सामने आई है। अब चेक बाउंस के मामले में आरोपित के बरी होने पर शिकायतकर्ता पीड़ित पक्षकार के रूप में सीधे सेशन कोर्ट में अपील कर सकेगा। इसके लिए उसे पहले की तरह हाई कोर्ट से विशेष अनुमति (स्पेशल लीव) लेने की आवश्यकता नहीं होगी।
मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने उज्जैन के एक मामले में यह व्यवस्था स्पष्ट की है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के न्याय दृष्टांत का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता को 60 दिन के भीतर संबंधित सेशन कोर्ट में अपील करने की स्वतंत्रता दी है।
मामला उज्जैन के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की कोर्ट से जुड़ा है। वर्ष 2019 में चेक बाउंस का एक मामला दर्ज हुआ था। नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत दर्ज इस मामले में कोर्ट ने 12 अगस्त 2024 को परिवाद निरस्त करते हुए आरोपित को बरी कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए परिवादी ने हाई कोर्ट का रुख किया था।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के सेलिस्टियम फाइनेंशियल बनाम ए. ज्ञानसेकरन मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि चेक बाउंस होने से आर्थिक नुकसान उठाने वाला शिकायतकर्ता भी कानून की नजर में पीड़ित है। इसलिए उसे आरोपित के बरी होने के विरुद्ध अपील का अधिकार है। इसके लिए धारा 378(4) के तहत हाई कोर्ट से विशेष अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।
न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी ने शिकायतकर्ता को आदेश की प्रति मिलने से 60 दिन के भीतर संबंधित सेशन कोर्ट में अपील की स्वतंत्रता दी है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि तय अवधि में अपील दाखिल होने पर सेशन कोर्ट केवल समय-सीमा का आधार लेकर उसे खारिज नहीं करेगा, बल्कि कानून के अनुसार सुनवाई करेगा।
चेक बाउंस के पीड़ित को अपील का सीधा अधिकारमान लीजिए किसी व्यक्ति ने आपको चेक दिया और बैंक में भुगतान नहीं होने पर आपने उसके खिलाफ मामला दर्ज कराया। कोर्ट ने आरोपित को बरी कर दिया। ऐसी स्थिति में पहले शिकायतकर्ता को हाई कोर्ट में अपील करने के लिए विशेष अनुमति (स्पेशल लीव) लेनी पड़ती थी। अनुमति नहीं मिलने पर अपील प्रस्तुत ही नहीं हो पाती थी। क्या बदला?
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि चेक बाउंस से आर्थिक नुकसान उठाने वाला शिकायतकर्ता भी कानून की नजर में पीड़ित है। इसलिए वह पीड़ित के अधिकार के तहत अपील कर सकता है। इसके लिए हाई कोर्ट से विशेष अनुमति लेना जरूरी नहीं है।
कानून में इसका आधार पहले: दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 378(4) के तहत विशेष अनुमति लेकर अपील।
अब: CrPC की धारा 372 के परंतुक के तहत पीड़ित के रूप में अपील का अधिकार।
नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में इसका समकक्ष प्रविधान धारा 413 है।
इंदौर जिला न्यायालय में चेक बाउंस के एक लाख से ज्यादा केस लंबित हैं। पहले इन केस की सुनवाई सिर्फ पांच कोर्ट में होती थी, लेकिन अब सभी 60 कोर्ट में इन मामलों की सुनवाई होती है। एक अनुमान के मुताबिक चेक बाउंस के 15 प्रतिशत मामलों में परिवादी अपनी बात सिद्ध नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में अपील के लिए परिवाद पक्ष को हाई कोर्ट से अनुमति प्राप्त करना होती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। परिवादी सीधे सेशन कोर्ट में अपील प्रस्तुत कर सकेंगे।