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यूपीआई पर एमडीआर का असर ग्राहकों पर पड़ने की संभावना, बढ़ सकता है नकद लेनदेन

मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) सीधे ग्राहक से नहीं लिया जाएगा। इसका भुगतान सामान्य तौर पर मर्चेंट की तरफ से होता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ग्राहक...और पढ़ें

By bharat mandhanyaEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Tue, 22 Sep 2026 04:23:42 PM (IST)Updated Date: Tue, 22 Sep 2026 04:23:42 PM (IST)
यूपीआई पर एमडीआर का असर ग्राहकों पर पड़ने की संभावना, बढ़ सकता है नकद लेनदेन
नईदुनिया विमर्श में आर्थिक और बैकिंग मामलों के विशेषज्ञ सीए अनुज गुप्ता अपनी बात रखते हुए। (नईदुनिया)

HighLights

  1. नईदुनिया विमर्श में बोले सीए अनुज गुप्ता
  2. ग्राहक को अलग से एमडीआर दिखाई नहीं देगा, लेकिन कीमत बढ़ सकती है
  3. बीमा कंपनियों और रेलवे पर फ्लैट पांच परसेंट लगेगा

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) सीधे ग्राहक से नहीं लिया जाएगा। इसका भुगतान सामान्य तौर पर मर्चेंट की तरफ से होता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ग्राहक पर इसका कोई अप्रत्यक्ष असर नहीं पड़ेगा।

व्यापारी अपने मार्जिन, उत्पाद की कीमत या सर्विस चार्ज में बदलाव करके इस लागत को ग्राहक तक पहुंचा सकता है। ऐसे में ग्राहक को अलग से एमडीआर दिखाई नहीं देगा, लेकिन कीमत बढ़ सकती है। इस पूरी व्यवस्था का एक संभावित असर यह भी हो सकता है कि कुछ व्यापारी डिजिटल भुगतान के बजाय नकद भुगतान को प्राथमिकता देने लगें। यह बातें नईदुनिया विमर्श में आर्थिक और बैकिंग मामलों के विशेषज्ञ सीए अनुज गुप्ता ने यूपीआई भुगतान के नए नियम: बाजार, कारोबार और आमजन पर क्या होगा प्रभाव? विषय पर कही।

सीए अनुज गुप्ता ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति दो हजार रुपये से अधिक मर्चेंट पेमेंट करता है तो उस ट्रांजेक्शन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट एमडीआर लगेगा, जबकि कोई व्यक्ति किसी और व्यक्ति को पमेंट करता है तो उस पर चार्ज नहीं लगेगा। बीमा कंपनियों और रेलवे पर फ्लैट पांच परसेंट लगेगा। स्टॉक ब्रोकिंग पर 0.02 प्रतिशत है। एमडीआर पर 300 रुपये की कैप लगाई गई है।


साल 2016 में यूपीआइ के 90 हजार ट्रांजेक्शन हुए थे और उसकी वैल्यू तीन करोड़ रुपये थी। जबिक अगस्त 2026 में टोटल ट्रांजेक्शन 250 करोड़ ट्रांजेक्शन हुए थे और उनकी वैल्यू 29 से 30 लाख करोड़ रुपये थी। एमडीआर लगाने के कारणों के पीछे नेशनल पेमेंट कारपोरेशन आफ इंडिया का तर्क है कि यूपीआई इकोसिस्टम की कास्ट करीब बीस हजार करोड़ रुपये है। इस इकोसिस्टम में फिनटेक कपनियां बाती है। वहीं, सरकार भी इस क्षेत्र में सब्सिडी के जरिए अपना सहयोग देती है।

छोटे व्यापारियों के अलग प्रविधान

सीए अनुज गुप्ता ने अनुसार, छोटे व्यापारियों को लेकर भी व्यवस्था में अलग प्रविधान हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि पिछले तीन महीनों में किसी व्यापारी की हर महीने यूपीआइ से प्राप्त राशि एक लाख रुपये से कम रहती है, तो उसे छोटे व्यापारी की श्रेणी में रखा जा सकता है और उस पर एमडीआर नहीं लगेगा, लेकिन जैसे ही निर्धारित सीमा की शर्त पूरी नहीं होती, आगे के ट्रांजेक्शन पर शुल्क लागू होने की स्थिति बन सकती है। कई छोटे व्यापारियों का मार्जिन बहुत कम होता है। ऐसे में एक-दो प्रतिशत अतिरिक्त लागत भी उनके लिए महत्वपूर्ण होती है।

उनहोंने कहा कि एमडीआर को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसका वास्तविक आर्थिक भार किस पर आएगा। उन्होंने बताया कि यहा यह भी जा रहा है कि इस व्यवस्था के अंतर्गत 96 प्रतिशत ट्रांजेक्शन एमडीआर के दायरे में नहीं आएंगे, यह शुल्क सिर्फ सिर्फ चार प्रतिशत ट्रांजेक्शन पर लगने की संभावना है, लेकिन यह चार प्रतिशत शेष ट्रांजेक्शन के 66 प्रतिशत के बराबर है।

यूपीआई ने कंपनियों को नहीं हुई कमाई

सीए अनुुज गुप्ता ने बताया कि भारतीय आम तौर पर कैश में ही ट्रांसेक्शन करते थे। यूपीआइ के बाद अर्थव्यवस्था यूपीआई पर शिफ्ट हो गई। उपभाेक्ताओं के इस व्यवहार में यह बदलाव लाना यूपीआई की बड़ी उपलब्धि थी। 2016 में भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन के कार्यकाल में यूपीआई आया था।

यूपीआई के अंतर्गत भुगतानकर्ता और व्यापारी का बैंक अकाउंट एक आईडी में बदल गया। यूपीआई के ट्रांजेक्शन पर कोई चार्ज नहीं लगते, ऐसे में इस यूपीआई ने तेजी से वृद्धि की।

हालांकि, इस सिस्टम से बैंक कोई कमाई नहीं कर पा रहे थे, लेकिन फिनटेक कंपनियां चाहती थी कि उनके जरिए यूपीआइ के अधिक से अधिक ट्रांजेक्शन हो। इन कंपनियों ने भले ही यूपीआइ से कुछ न कमाया, लेकिन अपने ग्राहकों को एसआइपी सहित अन्य सुविधाएं उपलब्ध करवाई और इससे कमाई की।

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