
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। सरकार जनकल्याण शिविरों को आम जनता की समस्याओं के त्वरित समाधान का माध्यम बता रही है, लेकिन इन शिविरों में आए आवेदनों का विश्लेषण प्रशासनिक व्यवस्था की एक अलग तस्वीर भी सामने लाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, शिविरों में सबसे अधिक मांग राजस्व विभाग की सेवाओं की रही।
सबसे ज्यादा आवेदन चालू खसरा-खतौनी की प्रतिलिपि, चालू नक्शा, नामांतरण और सीमांकन जैसे कार्यों के लिए आए। प्रदेश में लोगों की सबसे बड़ी जरूरत आज भी जमीन से जुड़े दस्तावेज और रिकार्ड हैं। आंकड़ों के अनुसार, खसरा-खतौनी, चालू नक्शे, नामांतरण, सीमांकन के लिए ही 1.11 लाख से अधिक आवेदन आए। यह संख्या किसी भी अन्य सेवा की तुलना में कहीं अधिक है।
राजस्व सेवाओं के बाद सबसे अधिक मांग विभिन्न प्रमाणपत्रों की रही। स्थानीय निवासी प्रमाणपत्र के लिए 8,451, आय प्रमाणपत्र के लिए 6,679, अन्य पिछड़ा वर्ग के जाति प्रमाणपत्र के लिए 1,675 तथा अनुसूचित जाति-जनजाति के जाति प्रमाणपत्र के लिए 1,314 आवेदन दर्ज हुए। इससे स्पष्ट है कि सरकारी योजनाओं, प्रवेश प्रक्रियाओं और अन्य प्रशासनिक कार्यों के लिए प्रमाणपत्रों की जरूरत लगातार बनी हुई है।
दिलचस्प तथ्य यह है कि जिन योजनाओं को सरकार सबसे अधिक प्रचारित करती है, उनके लिए आवेदन अपेक्षाकृत कम रहे। आयुष्मान भारत योजना के लिए 840, समग्र सामाजिक सुरक्षा पेंशन के लिए 575, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के लिए 558 और लाड़ली लक्ष्मी योजना के लिए 315 आवेदन दर्ज किए गए।
जनकल्याण शिविरों के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में आम नागरिक की पहली प्राथमिकता अभी भी जमीन के रिकार्ड, नामांतरण, सीमांकन और जरूरी प्रमाणपत्र हैं। यह भी संकेत मिलता है कि राजस्व और प्रमाणपत्र संबंधी सेवाओं की नियमित व्यवस्था में ऐसी बाधाएं हैं, जिनके कारण लोगों को विशेष शिविरों का सहारा लेना पड़ रहा है।
यदि से सेवाएं समयबद्ध और सहज उपलब्ध हों, तो ऐसे शिविरों में इन सेवाओं के लिए इतनी बड़ी संख्या में आवेदन आने की आवश्यकता शायद न पड़े।
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