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मध्य प्रदेश में 21 साल बाद सड़कों पर लौटेंगी सरकारी बसें... बंद होने की इनसाइड स्टोरी और सरकार का नया प्लान

एमपी में 21 साल बाद थमेगा प्राइवेट बस ऑपरेटर्स का एकाधिकार! जानें क्यों रातों-रात गायब हो गई थीं सरकारी बसें, क्या था वह 'सफेद हाथी' फैसला और अब किस न...और पढ़ें

By ADITYA KUMAREdited By: ADITYA KUMAR
Publish Date: Tue, 30 Jun 2026 04:11:23 PM (IST)Updated Date: Tue, 30 Jun 2026 04:11:23 PM (IST)
मध्य प्रदेश में 21 साल बाद सड़कों पर लौटेंगी सरकारी बसें... बंद होने की इनसाइड स्टोरी और सरकार का नया प्लान
मध्य प्रदेश में सरकारी बसों के बंद होने की इनसाइड स्टोरी

HighLights

  1. फंड की कमी और घाटे के कारण बंद हुआ मध्य प्रदेश परिवहन निगम
  2. जनवरी 2005 में प्राइवेट बस मालिकों से सरकारी कॉन्ट्रैक्ट खत्म हुआ
  3. राज्य सरकार ने निगम को 70.5% का अपना हिस्सा देना बंद कर दिया था

मध्य प्रदेश में एक बार फिर कई सालों के बाद सरकारी बसें दौड़ती हुई दिखाई दे सकती हैं। जी हां, मध्य प्रदेश के परिवहन विभाग की वह बसें जो एक जमाने में प्रदेश की सड़कों पर दौड़ती थीं, वह अब वापसी करने जा रही हैं।

इसकी कवायद मध्य प्रदेश की मोहन सरकार ने शुरू कर दी है और इस पूरी योजना का ढांचा तैयार करने के निर्देश भी दे दिए गए हैं। माना यह जा रहा है कि 'मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा' के तहत एक बार फिर सरकारी बसों को मध्य प्रदेश की सड़कों पर उतारा जाएगा।


आइए इस रिपोर्ट में समझते हैं कि मध्य प्रदेश से सरकारी बसें गायब होने के पीछे की कहानी क्या थी, प्राइवेट लॉबी का इस पर क्या असर रहा और अब मोहन सरकार किस नए मॉडल के साथ इसकी शुरुआत करने जा रही है।

मध्य प्रदेश में सरकारी बसों का संचालन क्यों बंद किया गया?

मध्य प्रदेश की सड़कों पर आज जो प्राइवेट बसों का बोलबाला दिखाई देता है, उसकी बंद होने की कहानी साल 1990 के आसपास शुरू हो गई थी। साल 2000 से पहले मध्य प्रदेश परिवहन निगम की कई बसें बेची गईं। इसके बाद प्राइवेट बस संचालकों से परिवहन विभाग का एक नया अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) हुआ। इस व्यवस्था में बस और ड्राइवर प्राइवेट हुआ करते थे, जबकि बस का कंडक्टर रोडवेज यानी मध्य प्रदेश सरकार का होता था, जिन्हें सरकार सैलरी देती थी।

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ये तस्वीर एआई से जेनरेट की गई है

साल 2005 में प्राइवेट बस ओनर्स से सरकार का यह अनुबंध समाप्त हो गया। इसके साथ ही, मध्य प्रदेश सड़क परिवहन निगम में केंद्र सरकार का हिस्सा 29.5% और राज्य सरकार का हिस्सा 70.5% था। बसों को चलाने को लेकर राज्य सरकार ने धीरे-धीरे अपने हिस्से का फंड देना बंद कर दिया, जिससे निगम भारी घाटे में चला गया।

परिवहन निगम को बंद करने से पहले सरकार के पास तीन विकल्प थे...

  • पहला विकल्प: एक छोटे सेटअप में बसें चलाना, जिसमें लगभग 900 करोड़ रुपये का खर्च आता।
  • दूसरा विकल्प: परिवहन विभाग को दोबारा जीवित कर पूर्ण स्वरूप में बसें चलाना, जिसमें लगभग 1400 करोड़ रुपये का खर्च आता।
  • तीसरा विकल्प: विभाग को पूरी तरह से बंद कर देना, जिसमें कर्मचारियों को वीआरएस (VRS) देने के लिए 1600 करोड़ रुपये का खर्च आना था।

तत्कालीन बाबूलाल गौर सरकार ने जनवरी 2005 में तीसरे विकल्प को चुना और अधिकांश कर्मचारियों को वीआरएस देकर मध्य प्रदेश में सरकारी बसों के पहियों पर हमेशा के लिए फुल स्टॉप लगा दिया।

बंद होने का प्रभाव: जनता और आश्रितों पर क्या बीती?

सरकारी बस सेवा बंद होने का सबसे बड़ा झटका प्रदेश के उन लाखों यात्रियों और मध्यमवर्गीय परिवारों को लगा, जो सुरक्षित और किफायती सफर के लिए पूरी तरह रोडवेज पर निर्भर थे। परिवहन निगम के बंद होने से हजारों कर्मचारी और उनके परिवार सीधे तौर पर प्रभावित हुए, जिन्हें समय से पहले वीआरएस लेना पड़ा।

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ये तस्वीर एआई से जेनरेट की गई है

सरकारी बसें बंद होने के बाद ग्रामीण और सुदूर अंचलों का संपर्क बड़े शहरों से टूट गया। इसका सीधा फायदा निजी बस ऑपरेटरों को मिला, जिससे परिवहन व्यवस्था पूरी तरह निजी हाथों में केंद्रित हो गई।

प्राइवेट बस ओनर्स की मजबूत लॉबी और जनता की परेशानियां

कई अटकलें ऐसी भी हैं कि मध्य प्रदेश में प्राइवेट बस संचालकों की लॉबी बेहद मजबूत है और समय-समय पर इस लॉबी के सरकार और अफसरों पर हावी रहने व मिलीभगत के आरोप लगते रहे हैं। इससे पहले शिवराज सरकार में भी सरकारी बसें शुरू करने की कवायद हुई थी, लेकिन इस मजबूत लॉबी के आगे योजनाएं ठंडे बस्ते में चली गईं।

रोडवेज बसें न होने से वर्तमान में जनता को कई गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है...

मनमाना किराया: यात्रियों की अक्सर शिकायत रहती है कि प्राइवेट बस संचालक मनमाना किराया वसूलते हैं।

सख्ती की कमी: परिवहन विभाग द्वारा निजी बसों पर उचित कार्रवाई न करने के आरोप लगते रहे हैं।

सुरक्षा और जनसुविधा का अभाव: त्योहारों या छुट्टियों के दिनों में निजी बसें ओवरलोडिंग करती हैं और यात्रियों से दोगुनी वसूली की जाती है।

मोहन सरकार का नया मॉडल: क्या है पीपीपी (PPP) और सुगम परिवहन योजना?

अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार प्रदेश में सरकारी बसों को पीपीपी (Public Private Partnership - पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल के तहत वापस लाने जा रही है। इस मॉडल में सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर सार्वजनिक सुविधाओं के लिए काम करते हैं। इसके लिए 'मध्य प्रदेश यात्री परिवहन एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड' नामक एक राज्यस्तरीय होल्डिंग कंपनी और सात सहायक क्षेत्रीय कंपनियों का गठन किया गया है।

अब की स्थिति और संचालन का पूरा प्लान

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ये तस्वीर एआई से जेनरेट की गई है

  • 7 क्षेत्रों में विभाजन: प्रदेश को सात क्षेत्र इंदौर, उज्जैन, भोपाल, जबलपुर, सागर, ग्वालियर एवं रीवा में बांटकर बसों का संचालन किया जाएगा।
  • रूट्स और बसों की संख्या: प्रदेश में सभी श्रेणी के कुल 1164 मार्गों को चिह्नित किया गया है, जिसमें कुल 5206 बसें संचालित होंगी। पहले चरण में 620 मार्गों पर 2432 बसें चलेंगी।
  • इंदौर से शुरुआत: करीब 19-21 साल बाद जुलाई-अगस्त में इंदौर से इसकी शुरुआत होने जा रही है। इंदौर क्षेत्र में 121 मार्गों पर 608 बसें और महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान व यूपी के लिए 101 मार्गों पर 276 बसें एआईसीटीएल (AICTL) द्वारा चलाई जाएंगी। इसके साथ ही, जुलाई में ही पीएम ई-बस सेवा के अंतर्गत 150 नई बसों का संचालन भी इंदौर शहर से शुरू होगा।
  • लागत: इस पूरी पीपीपी मॉडल योजना को धरातल पर उतारने के लिए लगभग 99 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया है।

शुरुआत से क्या होगा फायदा? (जनता, नौकरी और प्रशासन का नजरिया)

  • जनता के लिए: सरकारी बसों के आने से निजी ऑपरेटरों की मनमानी और एकाधिकार खत्म होगा। यात्रियों को किफायती, सुरक्षित और निर्धारित किराए पर यात्रा करने की सुविधा मिलेगी। अंतरराज्यीय और उपनगरीय मार्गों के जुड़ने से कनेक्टिविटी बेहतर होगी।
  • नौकरी और रोजगार: इस योजना के तहत बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित होंगे। होल्डिंग कंपनी और सात क्षेत्रीय सहायक कंपनियों में कुल 1330 पद (140 होल्डिंग और 1190 क्षेत्रीय कंपनियों में) स्वीकृत किए गए हैं। इन पदों पर प्रतिनियुक्ति, संविदा और संविलयन के आधार पर अगले चार वर्षों में चरणबद्ध तरीके से भर्तियां की जाएंगी।
  • प्रशासन के लिए: कलेक्टरों और नगरीय निकायों के माध्यम से बस सेवाओं तथा बस अड्डों की जनसुविधाओं को आधुनिक और बेहतर बनाने का मौका मिलेगा। परिवहन विभाग के पास पीपीपी मॉडल के जरिए राजस्व और नियंत्रण दोनों को मजबूत करने का एक पारदर्शी जरिया होगा।

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ये तस्वीर एआई से जेनरेट की गई है

19 साल पहले बंद हुई सरकारी बस सेवा का दोबारा शुरू होना मध्य प्रदेश के नागरिकों के लिए किसी बड़ी सौगात से कम नहीं है। यदि मोहन सरकार इस पीपीपी मॉडल को पूरी पारदर्शिता के साथ जमीन पर उतारने में सफल रहती है, तो यह जनता के लिए सफर का एक नया युग होगा।