
मध्य प्रदेश में एक बार फिर कई सालों के बाद सरकारी बसें दौड़ती हुई दिखाई दे सकती हैं। जी हां, मध्य प्रदेश के परिवहन विभाग की वह बसें जो एक जमाने में प्रदेश की सड़कों पर दौड़ती थीं, वह अब वापसी करने जा रही हैं।
इसकी कवायद मध्य प्रदेश की मोहन सरकार ने शुरू कर दी है और इस पूरी योजना का ढांचा तैयार करने के निर्देश भी दे दिए गए हैं। माना यह जा रहा है कि 'मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा' के तहत एक बार फिर सरकारी बसों को मध्य प्रदेश की सड़कों पर उतारा जाएगा।
आइए इस रिपोर्ट में समझते हैं कि मध्य प्रदेश से सरकारी बसें गायब होने के पीछे की कहानी क्या थी, प्राइवेट लॉबी का इस पर क्या असर रहा और अब मोहन सरकार किस नए मॉडल के साथ इसकी शुरुआत करने जा रही है।
मध्य प्रदेश की सड़कों पर आज जो प्राइवेट बसों का बोलबाला दिखाई देता है, उसकी बंद होने की कहानी साल 1990 के आसपास शुरू हो गई थी। साल 2000 से पहले मध्य प्रदेश परिवहन निगम की कई बसें बेची गईं। इसके बाद प्राइवेट बस संचालकों से परिवहन विभाग का एक नया अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) हुआ। इस व्यवस्था में बस और ड्राइवर प्राइवेट हुआ करते थे, जबकि बस का कंडक्टर रोडवेज यानी मध्य प्रदेश सरकार का होता था, जिन्हें सरकार सैलरी देती थी।

ये तस्वीर एआई से जेनरेट की गई है
साल 2005 में प्राइवेट बस ओनर्स से सरकार का यह अनुबंध समाप्त हो गया। इसके साथ ही, मध्य प्रदेश सड़क परिवहन निगम में केंद्र सरकार का हिस्सा 29.5% और राज्य सरकार का हिस्सा 70.5% था। बसों को चलाने को लेकर राज्य सरकार ने धीरे-धीरे अपने हिस्से का फंड देना बंद कर दिया, जिससे निगम भारी घाटे में चला गया।
तत्कालीन बाबूलाल गौर सरकार ने जनवरी 2005 में तीसरे विकल्प को चुना और अधिकांश कर्मचारियों को वीआरएस देकर मध्य प्रदेश में सरकारी बसों के पहियों पर हमेशा के लिए फुल स्टॉप लगा दिया।
सरकारी बस सेवा बंद होने का सबसे बड़ा झटका प्रदेश के उन लाखों यात्रियों और मध्यमवर्गीय परिवारों को लगा, जो सुरक्षित और किफायती सफर के लिए पूरी तरह रोडवेज पर निर्भर थे। परिवहन निगम के बंद होने से हजारों कर्मचारी और उनके परिवार सीधे तौर पर प्रभावित हुए, जिन्हें समय से पहले वीआरएस लेना पड़ा।

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सरकारी बसें बंद होने के बाद ग्रामीण और सुदूर अंचलों का संपर्क बड़े शहरों से टूट गया। इसका सीधा फायदा निजी बस ऑपरेटरों को मिला, जिससे परिवहन व्यवस्था पूरी तरह निजी हाथों में केंद्रित हो गई।
कई अटकलें ऐसी भी हैं कि मध्य प्रदेश में प्राइवेट बस संचालकों की लॉबी बेहद मजबूत है और समय-समय पर इस लॉबी के सरकार और अफसरों पर हावी रहने व मिलीभगत के आरोप लगते रहे हैं। इससे पहले शिवराज सरकार में भी सरकारी बसें शुरू करने की कवायद हुई थी, लेकिन इस मजबूत लॉबी के आगे योजनाएं ठंडे बस्ते में चली गईं।
मनमाना किराया: यात्रियों की अक्सर शिकायत रहती है कि प्राइवेट बस संचालक मनमाना किराया वसूलते हैं।
सख्ती की कमी: परिवहन विभाग द्वारा निजी बसों पर उचित कार्रवाई न करने के आरोप लगते रहे हैं।
सुरक्षा और जनसुविधा का अभाव: त्योहारों या छुट्टियों के दिनों में निजी बसें ओवरलोडिंग करती हैं और यात्रियों से दोगुनी वसूली की जाती है।
अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार प्रदेश में सरकारी बसों को पीपीपी (Public Private Partnership - पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल के तहत वापस लाने जा रही है। इस मॉडल में सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर सार्वजनिक सुविधाओं के लिए काम करते हैं। इसके लिए 'मध्य प्रदेश यात्री परिवहन एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड' नामक एक राज्यस्तरीय होल्डिंग कंपनी और सात सहायक क्षेत्रीय कंपनियों का गठन किया गया है।

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19 साल पहले बंद हुई सरकारी बस सेवा का दोबारा शुरू होना मध्य प्रदेश के नागरिकों के लिए किसी बड़ी सौगात से कम नहीं है। यदि मोहन सरकार इस पीपीपी मॉडल को पूरी पारदर्शिता के साथ जमीन पर उतारने में सफल रहती है, तो यह जनता के लिए सफर का एक नया युग होगा।