
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। फिल्म हक की रिलीज का रास्ता साफ हो गया है। फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग करने वाली याचिका मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने खारिज कर दी। मंगलवार को सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था जो गुरुवार को जारी हुआ। कोर्ट ने माना कि जयललिता और वीरप्पन को लेकर भी पूर्व में फिल्में बन चुकी हैं। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हाई कोर्ट में यह याचिका शाहबानो बेगम की बेटी सिद्धिका बेगम ने दायर की थी।
उनका कहना है कि फिल्म शाहबानो के जीवन पर आधारित है। इसमें व्यक्तिगत घटनाओं का चित्रण किया गया, लेकिन इसके लिए शाहबानो के उत्तराधिकारियों से किसी तरह की सहमति भी नहीं ली गई। याचिका की सुनवाई न्यायमूर्ति प्रणय वर्मा की पीठ में चल रही थी। मंगलवार को कोर्ट ने करीब डेढ घंटे मामले में बहस सुनी थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि फिल्म के टीजर और ट्रेलर एक काल्पनिक कहानी बुनते हैं जो इसमें शामिल व्यक्तियों के व्यक्तित्व और निजी जीवन को विकृत करती है। फिल्म निर्माताओं की ओर से एडवोकेट एचवाय मेहता, चिन्मय मेहता, ऋतिक गुप्ता, अजय बागडिया पैरवी कर रहे थे।
इन अधिवक्ताओं ने तर्क रखा था कि फिल्म की शुरुआत में ही स्पष्ट किया गया है कि यह काल्पनिक कहानी है बायोपिक नहीं है। इसलिए इस फिल्म को बनाने के लिए शाहबानो के उत्तराधिकारियों से सहमति लेने की आवश्यकता ही नहीं थी। एडवोकेट मेहता ने तर्क रखते हुए एक दर्जन के लगभग न्याय दृष्टांत प्रस्तुत किए। कहा कि शाहबानो बेगम की वर्ष 1992 में मृत्यु हो चुकी है। उनकी मृत्यु के बाद उनके बच्चों को उनकी मानहानि इत्यादि के बारे में सवाल उठाने का अधिकार ही नहीं है। विशेषज्ञों ने फिल्म को देखने के बाद ही प्रमाण पत्र जारी किया है।
वकीलों ने यह तर्क भी रखा कि वर्ष 2024 में ही यह सार्वजनिक हो चुका था कि शाहबानो केस को लेकर फिल्म बनने वाली है, लेकिन याचिकाकर्ता ने उस वक्त कोई आपत्ति नहीं ली। अब जब फिल्म रिलीज के लिए तैयार है तो आपत्ति उठाई जा रही है। बहस के दौरान फिल्म निर्माताओं की ओर से वकीलों ने बताया था कि वीरप्पन और जयललिता को लेकर भी पूर्व में फिल्म बनाई जा चुकी है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
वर्ष 1978 में पति द्वारा तलाक दिए जाने के बाद इंदौर निवासी शाहबानो नामक महिला ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता पाने के लिए जिला कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। जिला कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। इस फैसले के खिलाफ शाहबानो के पति की ओर से अपील प्रस्तुत हुई, लेकिन हाई कोर्ट ने भी जिला कोर्ट के फैसले को यथावत रखा। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने भी जिला और हाई कोर्ट के फैसले को यथावत रखते हुए फैसला सुनाया था कि यह धारा मुस्लिम महिलाओं सहित सभी पर लागू होती है और पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। हालांकि, इस फैसले को लेकर मुस्लिम संगठनों के विरोध के बाद, तत्कालीन सरकार ने एक कानून पारित किया जिसने मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण को केवल इद्दत अवधि तक सीमित कर दिया।