
रुमनी घोष, इंदौर। मध्यप्रदेश में चल रहे किसान आंदोलन में छह किसानों की मौत की घटना और बेकाबू होते आंदोलन से बचाव का रास्ता ढूंढने के लिए भाजपा सरकार 1998 में हुए मुलताई किसान गोलीकांड याद दिलाने में जुट गई है। गुरुवार को दिल्ली में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने बयान देकर इसे और बल दे दिया।
उन्होंने कहा जो कांग्रेस आरोप लगा रही है, उसके कार्यकाल में मुलताई हत्याकांड जैसी घटना हो चुकी है, जिसमें पुलिस फायरिंग में 24 किसान (थाने के रिकॉर्ड मुताबिक 22) मारे जा चुके थे। फायरिंग का आदेश तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह ने ही दिया था। दो अलग-अलग परिदृश्यों में हुए किसान आंदोलन में उस समय कांग्रेस सरकार थी और वर्तमान में भाजपा सरकार...। दोनों ही सरकारों ने किसानों के आंदोलन को दबाने के लिए एक जैसी रणनीति अपनाई, एक जैसी गलती की, एक जैसी राजनीति खेली और नतीजा भी लगभग एक ही जैसा नजर आ रहा है। नईदुनिया पड़ताल -
तब भी किसानों से बात नहीं की
मुलताई गोली कांड
एजेंडा : बैतूल जिले की मुलताई तहसील में 1998 में ओलावृष्टि और अतिवृष्टि से खराब हुए गेहूं की फसलों पर किसान 5000 रुपए प्रति एकड़ की दर से मुआवजा मांग रहे थे। यहां तीन साल से लगातार न तो कांग्रेस के एजेंडे में मुआवजा दिए जाने की बात थी और न ही दिग्विजयसिंह सरकार ने किसानों की मांग पर कोई गौर किया। इस वजह से प्रदेश में मुलताई ब्लॉक के लगभग 2500 किसानों ने मिलकर आंदोलन की चेतावनी दी।
सरकार की नीति : लगभग हफ्तेभर से चल रहे इस आंदोलन को लेकर कांग्रेस सरकार ने कोई गंभीरता नहीं बरती। किसानों ने 12 जनवरी 1998 को तहसील मुख्यालय घेरने की चेतावनी दी तो भारी पुलिस बल लगा दिया गया। आसपास के गांवों से किसानों को मुलताई नहीं पहुंचने देने के लिए रास्ते ब्लॉक कर दिए तो विवाद भड़क गया। पथराव शुरू होते ही पुलिस ने फायरिंग शुरू की।
मौतें : मुलताई थाने के रिकॉर्ड अनुसार इस घटना में 22 किसानों की मौत हुई और 150-200 घायल हो गए।
सरकार का गफलतभरा बयान : मुलताई गोलीकांड में भी पहले सरकार यह कहकर मुकर गई थी कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई है। बाद में स्वीकारना पड़ा कि पुलिस फायरिंग हुई थी और आंदोलन में मौजूद किसानों की मौत हुई थी।
कांग्रेस सरकार का आरोप : तब कांग्रेस सरकार ने आरोप लगाया था कि भाजपा समर्थित राजनीतिक दल किसानों को भड़का रहे हैैं और चारों ओर हिंसा फैला रही है।
भाजपा का बयान : प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने घटना के बाद इसे जलियांवाला बाग कहते हुए तत्कालीन कलेक्टर और एसपी पर केस दर्ज करने की मांग की थी। भाजपा की सरकार आने के बाद उन्हीं अधिकारियों का प्रमोशन हो गया।
जांच आयोग गठित : घटना के बाद कांग्रेस सरकार ने पीसी अग्रवाल के नेतृत्व में जांच आयोग गठित किया था। इसकी 100 पेज की रिपोर्ट भी आई, लेकिन इस पर फिर कभी विध्ाानसभा में चर्चा नहीं हुई। जबकि 13 साल से भाजपा की सरकार है।
गोलीकांड का कारण : पीसी अग्रवाल के अधीन बनाई गई इस जांच कमेटी की रिपोर्ट में गोलीकांड का कारण संवादहीनता बताई गई। यानी किसानों और प्रशासन के बीचआंदोलन के मुद्दों को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई।
मुआवजा : इस मामले में दोषी ठहराए गए डॉ. सुनीलम के अनुसार आंदोलन के बाद देश में पहली बार 4 करोड़ रुपए का फसल बीमा बांटा गया, लेकिन पीड़ित किसानों की जो 5000 रुपए प्रति एकड़ मुआवजे की मांग थी, वह अभी तक किसी को नहीं मिला।
सजा : इस आंदोलन की अगुआई कर रहे डॉ. सुनीलम सहित तीन को किसानों को भड़काने और फायर ब्रिगेड कर्मचारी की मौत के आरोप में आजीवन कारावास की सजा हुई। भाजपा पर आंदोलन भड़काने के आरोप के बावजूद किसी भी बड़े नेता पर केस दर्ज नहीं हुआ।
...और ऐसे हुई थी राजनीति : तब भाजपा का कोई भी राष्ट्रीय स्तर का नेता मुलताई नहीं पहुंचा था। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा अनशन पर भी बैठे थे।
मंदसौर गोली कांड
एजेंडा : सरकार ने चुनाव एजेंडे में किसानों को लागत मूल्य से 50 फीसदी अध्ािक मूल्य देने का आश्वासन दिया, लेकिन किसानों को समर्थन मूल्य से भी कम दाम मिल रहे हैं। यूपी और तमिलनाडु सरकार द्वारा कर्ज माफी की घोषणा और महाराष्ट्र सरकार द्वारा इसके आश्वासन के बाद मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ अंचल के पांच बड़े जिलों इंदौर, उज्जैन, मंदसौर, नीमच, देवास सहित पूरे इलाकों में किसानों ने आंदोलन शुरू किया। बिना नेतृत्व के इस आंदोलन में किसान खुद-ब-खुद जुड़ते चले जा रहे हैं।
सरकार की नीति : लगभग महीनेभर से मैसेज के जरिए 1 जून को प्रदेशभर में आंदोलन की सूचना वायरल होती रही। 1 जून को किसानों ने दूध, सब्जी, अनाज सबकी सप्लाय रोक दी। तीन दिन तक सरकार ने कोई सुध नहीं ली। उसके बाद सरकार ने किसान संघ को बुलाकर मांगें मानने का आश्वासन देकर हड़ताल खत्म करने की घोषणा कर दी। इससे किसान और भड़क गए और आंदोलन बेकाबू हो गया।
मौतें : 6 जून 2017 को मंदसौर के किसान आंदोलन में करीब डेढ़ हजार किसान, पुलिस, सीआरपीएफ तीनों आमने-सामने हो गए। इसके बाद पुलिस फायरिंग हुई। इसमें 5 किसानों की मौत हो गई। इसके बाद अन्य जिलों में सैकड़ों गाड़ियां जलाई गईं, थाने फूंके गए।
सरकार का गफलतभरा बयान : गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह ने पहले कहा गोली नहीं चली। फिर थोड़ी देर बाद सरकार का बयान आया गोली चली। इस विवाद के बीच आईजी (कानून व्यवस्था) मकरंद देउस्कर ने माना कि पुलिस फायरिंग हुई।
सरकार का आरोप : सरकार इसके लिए कांग्रेस पर आरोप लगा रही है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने भी खुद यह बयान दोहराया।
कांग्रेस का बयान
जांच आयोग गठित : घटना के बाद न्यायिक जांच आयोग गठित करने की घोषणा की हैै।
गोलीकांड का कारण : जांच आयोग की रिपोर्ट तो अभी नहीं आई है, लेकिन प्रारंभिक कारण संवादहीनता ही बताया जा रहा है।
मुआवजा : घटना के लगभग 12 घंटे के भीतर सरकार ने तीन बार मुआवजे की राशि बदली। पहले 10 लाख, फिर 25 लाख और परिजन के नहीं मानने पर सीधे एक करोड़ का मुआवजा और एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की।
सजा : मंदसौर के एडिशनल एसपी अजयप्रताप सिंह के अनुसार इस मामले में 28 प्रकरण दर्ज किए गए और 72 आरोपी बनाए। इसमें अभी तक कांग्रेस के किसी भी बड़े नेता का नाम शामिल नहीं है।
... और ऐसे हुई थी राजनीति : गुरुवार को कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी मंदसौर में पीड़त किसानों से मिलने पहुंचे, लेकिन उन्हें राजस्थान और मध्यप्रदेश की सीमा पर नयागांव में ही गिरफ्तार कर लिया गया।