- 11940 फीट की ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी से एक-एक कदम चलना मुहाल था वहां योगासन कर साबित किया कि शरीर को किसी भी स्थिति में ढाला जा सकता है

इंदौर। नईदुनिया रिपोर्टर

पिछले साल 'विश्व योग दिवस' के मौके पर मैं कैलाश मानसरोवर के पास 11940 फीट की ऊंचाई पर स्थित हिल्सा पहाड़ी पर 35 सदस्यीय दल के साथ था। इसमें भारत के अलावा अमेरिका और दुबई के लोग भी शामिल थे। ऑक्सीजन की कमी से एक-एक कदम चलना मुश्किल हो रहा था। ऐसे में योग के बारे में कोई सोचना भी नहीं चाहता था। लेकिन मुझे तो हर हाल में 'योग डे' सेलिब्रेट करना था। मैंने उन्हें समझाया कि जो लोग यहां के आसपास के क्षेत्रों में 24 घंटे रहते हैं, पूरी जिंदगी गुजार देते हैं, वो भी तो इंसान हैं। अगर वो यहां जीवन की हर गतिविधि कर सकते हैं तो हम योग क्यों नहीं कर सकते। लोगों को बात जम गई और फिर हमने वहां कई योगासन और प्राणायाम किए। जहां एक कदम भी चलना मुहाल था, वहां योगासन करने से ये तो साबित हो गया कि इंसान अपने शरीर को किसी भी स्थिति में ढाल सकता है, बस जरूरत ऊंचे मनोबल की है। आपका शरीर विषम से विषम परिस्थिति को भी स्वीकार करने में सक्षम है।

ये कहना है कि योग ट्रेनर और सेल्फ हीलर कृष्णा मिश्रा का। वो इस साल लॉस एंजिल्स के लांग बीच के पास इमेजिनेशन क्रूज पर सुबह 9.30 बजे योग करेंगे। मैक्सिको के इस क्रूज में उस वक्त करीब छह हजार लोग मौजूद रहेंगे। जिनमें से अधिकांश उनके साथ योग भी करेंगे। अब तक करीब 10 देशों के लोगों को योग और सेल्फ हीलिंग के चमत्कारिक अनुभवों से रूबरू करा चुके कृष्णा अमेरिका के विभिन्न शहरों में रहने वाले लोगों को योग और सेल्फ हीलिंग की ट्रेनिंग देने के लिए 22 मई को सिएटल के लिए रवाना हो रहे हैं।

उड़ते विमान में फिल्म शूटिंग हो सकती है तो योग क्यों नहीं?

वे बताते हैं कि मैंने 2017 में उड़ते हवाई जहाज पर योग की परमिशन मांगी थी, लेकिन सुरक्षा कारणों से मुझे यह नहीं दी गई। 2020 में मैं इसके लिए फिर प्रयास करूंगा, क्योंकि अगर उड़ते विमान में फिल्म शूटिंग हो सकती है तो योग करने में क्या दिक्कत हो सकती है। मैंने ये भी देखा है कि बुल्गारिया और थाईलैंड में टीवी सेट पर कई बार ऐसे योगासन भी दिखाए जाते हैं, जिनसे यात्री बैठे-बैठे ही खुद को रिलैक्स कर लेते हैं। फिर दुनिया को योग जैसे अनमोल उपहार देने वाले देश में ही इस पर पाबंदी क्यों है?

1982 में डॉक्टरों ने जवाब दे दिया, तब योग अपनाया

56 साल के कृष्णा बताते हैं 1982 में ब्रेन ट्यूमर के ऑपरेशन के चलते सिर में करीब 40 टांके लगाने पड़े थे। उससे पहले डॉक्टरों ने घरवालों को चेतावनी दी थी कि ट्यूमर बहुत बड़ा है, इसलिए ऑपरेशन बहुत रिस्की है। हम तो यही सजेस्ट करेंगे कि इसे ले जाओ और एक-दो महीने जो भी जिंदगी बची है, उसमें ये जो भी खाना-पीना चाहता है, खिलाओ-पिलाओ। मगर मेरी मां ने कहा कि आप ऑपरेशन करें, बाकी भगवान की मर्जी पर छोड़ दें। खैर...ऑपरेशन सफल रहा मगर मेरे धड़ का पूरा दाहिना हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया और मैं परिवार पर बोझ बन गया। लेकिन फिर मैंने अपनी जीवनशैली पूरी तरह बदल ली। खान-पान, रहन-सहन में सुधार किया और फिर धीरे-धीरे फिजियोथैरेपी, योग और सेल्फ हीलिंग से मैं लकवे से मुक्त हो गया। लेकिन दाहिने हाथ में उसका असर ज्यादा हुआ था, इसलिए मैं अब भी उससे लिख नहीं पाता हूं। लेकिन जीवन आगे बढ़ाना था, इसलिए मैंने बाएं हाथ से लिखना शुरू किया और कई परीक्षाएं पास करते हुए खुद को एलआईसी में सेवाएं देने योग्य बनाया। हालांकि इस बीच ऑपरेशन के चलते मुझे 2004 तक मिर्गी के दौरे आते रहे और उनसे बचने के लिए मैं 37 सालों से दवाएं ले रहा हूं।

(फोटो हैं)