
Night Culture in Indore: इंदौर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। इंदौर के लिए नाइट कल्चर नया नहीं है। इंदौर की रगों में तो यह संस्कृति होलकर शासनकाल के वक्त से रची बसी है। इंदौर में होलकर शासकों ने व्यापार-व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए प्रयास किए थे। उसी समय यहां आने वाले व्यापारियों और मजदूरों के खाने-पीने के लिए रात में दुकानें खुलने लगी थीं।
रात में भी व्यंजन की दुकानों पर भीड़ लगने का सिलसिला तो उस वक्त से बहुत ज्यादा चलन में आया जब यहां की कपड़ा मिलों से रात की पाली खत्म कर कर्मचारी घर जाने से पहले खानपान का आनंद लेते थे। फिर ट्रेन और बस सुविधा बढ़ी तो यात्री रात में भी इंदौर आने लगे और रात में खानपान के बाजार सजने लगे। अभी भी शहर में सराफा बाजार, 56 दुकान और राजवाड़ा क्षेत्र में रात को खाने का अलग ही बाजार सजता है, लेकिन यहां कभी कोई नशे में चूर होकर उत्पाद नहीं मचाता और रात में होने वाले अपराध के मामलों में भी यहां संख्या सबसे कम है। यहां का यह नाइट कल्चर तो पुरी दुनिया में प्रसिद्ध है।
बात अगर सराफा की करें तो दिन में यहां सोने-चांदी के आभुषण की दुकानें लगती हैं और रात में जब यह दुकानें बंद हो जाती हैं तो ओटलों पर व्यंजन की दुकानें लग जाती हैं। गहराती रात के साथ उसके शौकीनों का मजमा भी लग जाता है जो रात करीब 3 बजे तक जारी रहता है। 1930 में बने सराफा बाजार में करीब 70 वर्षों से रात को चौपाटी लगती आ रही है। मुख्य सराफा बाजार में ही वर्तमान में खानपान की 82 दुकानें रात्रिकालीन सराफा चाट चौपाटी एसोसिएशन से संबद्ध हैं। वहीं गैर पंजीकृत दुकानों की बात करें तो छोटा और बड़ा सराफा, पीपली बाजार, इमामबाड़ा, शकर बजार में खानपान की 50 से अधिक अधिक दुकानें रात में लगती है।
रात्रिकालीन सराफा चाट चौपाटी एसोसिएशन के अध्यक्ष रामजी गुप्ता के अनुसार, सराफा चाट चौपाटी में रात को बेशक खानपान की दुकानें लगती हैं, लेकिन कभी कोई अप्रिय घटना नहीं होती। इसकी वजह यहां परिवार का बहुतायत में आना, पारंपरिक व्यंजन की परोसगारी, दुकानदारों का बेहतर बर्ताव, रहवासी क्षेत्र होने के साथ-साथ थाना समीप होना और निजी सुरक्षा व्यस्था भी है।
इंदौर का 56 दुकान मार्केट भी चार दशक से भी अधिक पुराना है। निगम द्वारा यहां बनाई गई दुकानों को व्यापारियों ने खानपान की दुकान के रूप में 1977 के आसपास विकसित किया। धीरे-धीरे यहां खानपान का बाजार 56 दुकान के रूप में लगने लगा। सुबह से यहां खाने-खिलाने का सिलसिला शुरू हो जाता है जो रात में 11.30 बजे तक जारी रहता है। 56 दुकान व्यापारी संघ के अध्यक्ष गुजंन शर्मा और विजय सिंह बताते हैं कि इन चार दशकों में भी यहां किसी तरह की अप्रिय घटना नशा करने वालों के कारण नहीं हुई। इसकी वजह यहां का माहौल ही है। व्यंजन का स्वाद और दुकानदारों का व्यवहार बेहतर होने से यहां आने वाले लोगों का भी व्यवहार बेहतर होता है। यहां शुरू से ही पारिवारिक माहौल को बरकरार रखने पर दुकानदारों का जोर रहा इसका लाभ यह हुआ कि यहां असमाजिक तत्व या नशा करके आने वाले खुद भी कतराते हैं।