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इंदौर शहर के बीच है पंढरीनाथ मंदिर, रात में गर्भगृह में भगवान के लिए सजाई जाती है शैया

Pandharinath Temple Indore: इंदौर शहर के बीचों-बीच राजवाड़ा से थोड़ी दूरी पर स्थित है पंढरीनाथ मंदिर। यह भगवान विट्ठल और रखुमाई को समर्पित है और होलकर...और पढ़ें

By Harshal RathoreEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Sat, 25 Jul 2026 01:05:44 PM (IST)Updated Date: Sat, 25 Jul 2026 01:15:58 PM (IST)
इंदौर शहर के बीच है पंढरीनाथ मंदिर, रात में गर्भगृह में भगवान के लिए सजाई जाती है शैया
मंदिर में स्थापित भगवान विट्ठल का विग्रह। नईदुनिया

HighLights

  1. मल्हारराव होलकर द्वितीय ने इसे 1811 से 1833 के बीच मराठा शैली में बनवाया था
  2. पंढरपुर की तरह यहां भी आषाढ़ी एकादशी पर वारकरी संप्रदाय के भक्त दिंडी के रूप में आते हैं
  3. गर्भगृह में काले पाषाण से बनी भगवान विट्ठल की मूर्ति है, जिनकी ठोड़ी पर जड़ा हीरा जड़ा है

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। आधुनिकता के साथ कदमताल मिलाते इस शहर के दिल में आज भी इतिहास, परंपरा और आस्था की त्रिवेणी बहती है। गगनचुंबी इमारतों वाले शहर में आज भी धर्म की ध्वजा लहराती है। विकास की नित नई इबारत लिखते शहर में अतीत की उस परंपरा का साक्ष्य हर वर्ष दिया जाता है।

इसमें इस देश की आत्मा बसती है। वाहनों की रेलमपेल के बीच आज भी सिर पर तुलसी क्यारा रख सैकड़ों भक्त दिंडी के रूप में शहर के मध्य बने उस मंदिर में आते हैं जहां कमर पर हाथ रखे विट्ठल और रखुमाई अपने भक्तों के लिए खड़े हैं।


बेशक, इंदौर मालवा के पठार का हिस्सा है, देश का दिल कहे जाने वाले मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी है लेकिन साल का एक दिन ही सही यह मालवा से महाराष्ट्र में तब्दील हो जाता है। वह दिन कोई सरकारी घोषणा की औपचारिकता नहीं बल्कि आस्था के सूर्य और विश्वास के चंद्रमा की युक्ति वाला आषाढ़ी एकादशी का दिन होता है।

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महाराष्ट्र के पंढरपुर की तरह भव्य आयोजन बेशक इस शहर में नहीं होता हो पर भक्ति का सैलाब तो यहां भी उमड़ता है और सांकेतिक ही सही पर पूर्ण श्रद्धा के साथ वारकरी संप्रदाय के अनुयायी और श्रीहरी के भक्तों की भीड़ दिंडी के रूप में यहां उमड़ती है। इसका केंद्र बिंदु है पुराने इंदौर में निर्मित पंढरीनाथ मंदिर, जो कि राजवाड़ा से थोड़ी ही दूरी पर है।

भीतर और बाहर मूर्तियों का अंकन

पहली नजर में तो मंदिर सामान्य नजर आता है लेकिन यदि इसे ध्यान से देखा जाए तो इसकी खूबसूरती और भी निखरकर सामने आती है। मंदिर के भीतरी भाग में रंगीन पत्थर से दीवार पर सजावट की गई है। मंदिर के प्रदक्षिणा मार्ग की बाहरी दीवार पर बनी मूर्तियां भी बेहद सुंदर हैं। जिस तरह महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में भीमा नदी के किनारे पंढ़रपुर में भगवान विट्ठल का मंदिर बना है उसी तरह यहां भी यह मंदिर बनाया गया है।

वहां भीमा नदी के अर्धचंद्राकार तट पर मंदिर है और इंदौर में कान्ह नदी भी यहां इसी तरह की आकृति निर्मित करती है। इसलिए इस स्थान को चंद्रभागा भी कहा जाता है। शायद इसलिए ही यह मंदिर यहां बनवाया गया है और इसे भी पंढरीनाथ मंदिर नाम दिया गया है।

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होलकरकालीन है यह मंदिर

यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप विट्ठल और रखुमाई को समर्पित है। कान्ह नदी के किनारे इस मंदिर का निर्माण मल्हारराव होलकर द्वितीय ने वर्ष 1811 से 1833 में कराया था। मराठा शैली में बने तल विन्यास में गर्भगृह, सभा मंडप तथा मंडप विद्यमान है। गर्भगृह में भगवान विट्ठल का विशाल विग्रह स्थापित है।

काले पाषाण से बनी मूर्ति की खास बात यह भी है कि भगवान की ठोड़ी पर हीरा जड़ा हुआ है, जिसकी चमक दूर से ही नजर आती है। इसका मुख्य मंडप दो भागों पर आधारित है। गर्भगृह में प्रवेश के लिए सीढ़ियां हैं। प्रवेश मार्ग के स्तंभों पर श्रीगणेश व श्रीकार्तिकेय की मूर्ति बनी हुई है।

बात अगर स्थापत्य कला की करें तो मंदिर का शिखर नागर शैली का बना हुआ है। शिखर पर कीर्ति मुख के ऊपर आमलक (पत्थर को आंवले के आकार में तराशना) व पीतल के बड़े-बड़े कलश हैं। जिस पर धर्म ध्वजा सदा लहराती रहती है।

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दिलचस्प है इतिहास

रात में गर्भगृह में भगवान के लिए शैया भी सजाई जाती है और उन्हें चादर भी ओढ़ाई जाती है। दशहरे पर मुरलीधर के हाथों में तलवार रखी जाती है और महाशिवरात्रि पर भगवान शिव समान त्रिनेत्र धारण कराए जाते हैं। इतिहास पर नजर डालें तो आषाढ़ी एकादशी पर होलकर राज परिवार व्रत करता था और सभी सदस्य यहां दर्शन के लिए आते थे। द्वादशी पर ब्राह्मण भोज कराकर राज परिवार के सदस्य व्रत खोला करते थे। मंदिर का संचालन होलकर राजवंश द्वारा किया जाता था और इसी कारण शहर में दिंडी की परंपरा भी शुरू हुई।

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